सख्य सुमन
///सख्य सुमन///
गौओं के संग कृष्ण हमारे,
चले मधुबन वृंदावन की ओर।
कहे राधिका क्यों हम भोगें,
रहकर अकेले बरसाने की ठौर।।
चली राधिका सखी कृष्ण की,
और साथ सखी सखियां भी।
ढूंढते नयन श्याम सलोने को,
पलक डगर बिछी अखियां भी।।
देखो राधिके अमित प्रेम से,
तुमको देता हूं यह पुष्प पुंज।
कितने अथक प्रयत्न से ढूंढा,
मैंने यहां पुष्पित हरित कुंज।।
कहा श्याम ने प्रेमभर इतना,
लो राधिके भाव सख्य सुमन।
भाव भेंट से हृदय संजोना,
ना समझाना पदचापों का घन।।
राधिका ने इन पुष्पों में कुछ,
हृदय मधुर सुमन मिलाये।
पुष्प माल से संजो संजोकर,
मधुर सुहृत गीत थे गाए।।
नंदनवन में कृष्ण सम्मुख,
राधा के हाथों में माला थी।
पुनीत दृश्य देख-देख कर,
चट से ऐसा बोली राधा थी।।
यह प्रतिसाद तुम्हारे प्रेम का,
सम उज्जवल देवोपम हार।
समर्पित खिले-खिले पुष्पों का,
जिन समाया सुमृदुल प्यार।।
इस सुमृदुल सुमन हार को,
उर ग्रीवा में धारण कर लो।
धारण कर सुमृदु दलों की,
मंगल सुगंध जग में भर दो।।
तुम्हारे ऐसे मधु सुमनों को,
मैं पिरो हार बना लौटा दूंगी।
माला के सुगंध समंदर से,
भू भरना तब सुखी होऊंगी।।
स्वरचित मौलिक रचना
रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट(मध्य प्रदेश)