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31 Jul 2025 · 1 min read

उन्हें तवक्को थी

उन्हें तवक्को थी
के जो जख्म
वो दे रहे रहें हैं
तुम्हारे जतनों से
ना भरेंगे ,

उन्हें तवक्को थी
के उनके ठोकर से
जो गिर पड़े तो
नहीं उठोगे पड़े रहोगे

उन्हें तवक्को थी
के नातवाँ हो,
हस्सास हो तुम
गर नफ़्सी जंगें
वो छेड़ दे तो
हातमी फैसला समझ
तुम अपने हथियार
ही डाल दोगे,
नहीं लड़ोगे
न लड़ सकोगे

उन्हें तवक्को थी
के एक दिन तो
जो पानी सर से
गुजर चलेगा
और साँसें तुम्हारी
जवाब देंगी
तुम हार कर के
यही कहोगे
बहुत हुआ अब
हारते हैं

मगर उन्हें अब
यही तो दुःख है
यही तड़प है
कि जंग तुमने
क़ुबूल की है
बिखरते रेशे
समेट खुद ही
नशेमन भी
सहेज रक्खा
और घावों में
रख के मरहम
इक अपनी ही राह ली है

बहुत था आसां था
अना को अपनी
ही दफ़्न करके
पामाल राहों की
राह लेना
मगर जो तुमने
ये राह ले ली
सिवाय हक़ के
न कुछ भी चहिए
वहीं मुसीबत खड़ी हुई है

उन्हें है उलझन
के तुम खड़े हो
उन्हें है चिढ़ ये
के लाख तूफ़ां
को झेल कर भी
जले हो अब तक

उन्हें मुसीबत
तुम्हारी इस
सरकशी से ही है

उन्हें नहीं दुःख
तुम्हारे अश्कों का
जो तुम्हारी आँख के कोने में
ठिठके खड़े हुए हैं

उन्हें परेशानी
बस मुसलसल
तुम्हारे लब पे
थिरकती मुस्कान से है

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