कोशिश मैं लाख करूँ भावनाओं उद्गार
एक अनोल धरोहर
माता पिता को समर्पित काव्य सग्रह
” कोशिश मैं लाख करूँ ,भावनाओं का उद्गार ”
पुस्तक का नाम :- उद्गार काव्य सग्रह
पुस्तक रचियता :- श्री हंसराज सिंह हंस
पुस्तक मूल्य :- 300 /–
प्रकाशक :- मधुशाला प्रकाशन प्राईवेट लिमिटेड
समीक्षक :- डॉ अमित कुमार बिजनौरी
सशक्त कलम के हस्ताक्षर सौम्य छवि के धनी एक कुशल वक्ता सामाजिक चिंतक दार्शनिक व्यक्तित्व के धनी उत्तर प्रदेश सरकार के आधीन सहायक लेखा परीक्षा अधिकारी (असिस्टेंट ऑडिट अधिकारी ) के पद को सुशोभित मान है । जी है मैं बात करने जा रहा हूँ ,कवि श्री हंसराज सिंह हंस जो प्रयागराज की माटी में जन्में आज उन्हीं के द्धारा लिखित पुस्तक उद्गार काव्य सग्रह मेरे हाथों में है ।
पुस्तक की प्रूफरीडिंग में सहयोगी श्री प्रदीप अजनबी ,और जिन्हें आप अपना देवतुल्य संरक्षक मानते है श्री बाबूलाल दीक्षित ,आपके परम् मित्र सुनील कुमार और बड़े पुत्र शिरीष सिंह,पत्नी रीता सिंह, पुत्री शैली सिंह और छोटे बेटे मनीष कुमार आदि ने किया ।
पुस्तक का आवरण पृष्ठ इतना मनमोहक है कि प्रकृति छटा के बीच से निकलता हुआ सूरज ओर शांति के प्रतीक उड़ते हुए कबूतर को हाथ से पकड़ने का प्रयास मानो पुस्तक की आत्मा का बोध हो लेकिन यह वास्तव में पुस्तक को पढ़ने के बात सत्य प्रतीत होता है ।
पुस्तक के आवरण पृष्ठ को छोड़कर कुल पृष्ठों की संख्या 138 है ।
पुस्तक के आवरण पृष्ठ के पीछे कवि महोदय का संक्षिप्त जीवन परिचय ,सम्प्रति और साहित्यिक यात्रा में जो विशेष सम्मना प्राप्त किए उनको मुद्रित किया गया है ।
यह पुस्तक कवि महोदय ने आपने माता पिता को समर्पित की है । उनके वजह से पुस्तक की अमियत एक धरोहर के रूप में संरक्षित की हैं ।
श्री कृष्ण कुमार आई ए एस संयुक्त राज्य निर्वाचन आयुक्त जी का दिया गया शुभाशंस पत्र को पुस्तक में समुचित स्थान दिया गया है ।
प्रकाशकीय लेख और श्री डॉ सुनील दत्त थपलियाल आवज साहित्यिक संस्था मुनि की रेती ऋषिकेश उत्तराखंड जी के भावनाओं के पुष्प शीर्षक से उनके शब्दों के पुष्प अंकित है ।
पुस्तक की भूमिका स्वयं कवि महोदय ने अपने शब्दों के माध्यम से रखी है जो काबिले तारीफ है । पुस्तक में विषयो की कोई क्रमबद्धता नहीं है ।
उनकी एक रचना आपके समझ रखता हूँ ।
“कोशिश मैं लाख करूँ लेकिन ,
लेखनी नहीं कुछ लिख पाती ।
जब मन उमंग में होता है ,
कविता की धारा दिख जाती ।।”
विषय की भाँति पुस्तक में छन्दों का कोई क्रम नहीं है ।
पुस्तक में दोहे, कुण्डलियाँ, घनाक्षरी और कविताओं का बेजोड़ संगम है । पुस्तक को पढ़ते पढ़ते कई बार आँखे नम हो जाती है और कई बार जीवन को प्ररेणा दे जाती है और कभी कभी एक चिंतन(एक नई सोच) को जन्म दे देती है । पुस्तक को पढ़कर कवि की कितनी गहरी सोच है । कितना ईश्वर के प्रति लगाव है । कितनी समाज की चिन्ता है । पुस्तक में भिन्न भिन्न विषयों को केंद्र में रख कर जो सृजन किया है । कवि का दैदीप्यमान साफ साफ छलकता है ।
जब पुलवामा की घटना चौदह फरवरी को अविस्मरणीय दिन जो वीर शहीदों के महत्वपूर्ण एवं स्वर्णक्षरों से लिखा गया । उनको अश्रुपूरित विन्रम श्रद्धांजलि सुमन अर्पित शब्द—-
“कुछ बात बात कर चले गए ,
कुछ सीख सिखा कर चले गए ।
हम मस्त रहे गुलदस्तों में ,
वे जान लुटा कर चले गए ।।
अब मैं आपको उनकी पुस्तक की साहित्यिक यात्रा की सैर की तरफ ओर लेकर चलता हूँ ।
पृष्ठ न० 12 से 14 तक पुस्तक की अनुक्रमणिका को लिया गया है किस पृष्ठ पर किस शीर्षक के अंतर्गत कौन सी रचना है । बहुत ही सुव्यवस्थित ढंग से सुसज्जित किया गया है ।
पुस्तक में सबसे पहले गणेश वंदना की स्तुति से आगे बढ़ते हुए सरस्वती वंदना का आवाहन किया गया है ।
गुरू वंदना के माध्यम से कवि आपने शब्दो के पुष्प गुरू के श्रीचरणों में रखते हुए आगे बढ़ते है ।
भारत का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर भाग को कश्मीर सुषमा दोहवलि के माध्यम से बड़ी खूबसूरती से शब्दों को उकेरा है ।
आप अपनी माटी की पूजा अर्चना भी लिखने से नहीं रुके ।
पुस्तक में आपने उद्द्गर यानि कि आपने मनभावो को कविता के रूप में सृजित कर आपने सुंदर भाव रखें ।
कोई भी व्यक्ति बिना किसी की कृतज्ञता के बिना जीवन की यात्रा सरल सहज नही कर सकता । आपने अपने भावो में माँ को जीवंत लिखा । एक कवि का क्या धर्म होना चाहिए आपने कवि का धर्म शीर्षक से उन तथ्यों को उजागर किया है और एक संदेश देनी की कोशिश की ,
अपनी रचनाओं में ” मीठी वाणी , आया बसंत, बस आन मिलो एक बार पिया , विनय वंदना , माँ गंगे ने पुकारा है ,
सवेरा,यही कामना मेरी,कर दो ज्ञान प्रकाश,हुस्न उसका कमाल था या रब , नही होगी गरिमा खण्डित, कलयुगी तपस्या , गृहस्थी , धन, जानवर है पर हैवान नहीं , होली की शुभकामनाएं, विमल मति, ईश वंदना, प्राणवायु, योग एवं व्यायाम, परिश्रम, जीवन रेखा,बेटी, आदि ऐसे कविताओं के शीर्षक है जो मानुष के हिय में आसानी से पुस्तक अपनी जगह बनाने में सफल होगी ।
पुस्तक की भाषा शैली :- पुस्तक की भाषा शैली सहज सरल स्पष्ट है ।
भावपक्ष :- भाव पक्ष की दृष्टि से पढ़कर पता चलता है कि कवि महोदय ने सारा प्रेम अपनी सृजनात्मक रचनाओं में रख दिया है । भाव पक्ष की दृष्टि से पुस्तक की जितनी तारीफ की जाए कम है । क्योंकि कवि ने अपना ह्रदय निकालकर रख दिया है ।
कवि की कुछ रचनाओं के अंश
“तन को सुंदर रखिए, तन अनमोल है चीज
स्वर्ग और अपवर्ग के, है तन में ही बीज ।।”
“तन साधना है मोक्ष का, करो सदा सत्कर्म ।
सेवा दीन अनाथ की, है यह सच्चा धर्म ।।”
भावनात्मक जुड़ाव :- कविताओं को पढ़कर ऐसी अनुभति होती है की जैसे मानो मेरे जीवन से जुड़ी हुई रचनाएं है । कवि के भावों ने सुधिपाठको को बांधने का काम किया है । कुछ रचनाओं के अंश आपके अवलोकनार्थ
“”दैत्य बड़ा बलवान,यह है कोरोना नाम ।
रोज रोज ही दे रहा ,दर्द भरे पैगाम । “”
“”हर रोज जिंदगी में कुछ अजीब हो रहा है ।
बस आपकी दुआ से खुश नसीब हो रहा है ।।””
“”कितने हरे भरे लगते है,
पेड़ हमारे गाँव के ।
महुआ बरगद पीपल जामुन,
देते सुंदर छाँव ये ।।””
“”बेटी को खूब पढ़ना है
भारत का भाग्य जगाना है “”
“”कितनी पावन कितनी निर्मल
पतित पावनी मैं गंगा ।
डुबकी लेकर जल में होता
मन प्रसन्न अरु तन चंगा ।।””
“”धर्म बहुत संसार में ,पर यह धर्म महान ।
सेवा मानव जाति की, सौ सौ यज्ञ समान । “”
छन्दत्मक आधार से :- कवि ने बहुत खूब सुरती से कई छन्दों से अपनी कविताओं को नवाजा है । जैसे दोहा घनाक्षरी कुण्डलियाँ आदि छन्दों से सुसज्जित सृजन है ।
आप भी गौर करिए
“”मातु शारदे गयी अब, दे अक्षय वरदान ।
खाली खाली सा लगे, टूट गया अभिमान ।।””
“”शंख चक्र ले हाथ मे,गदा पदम् के साथ ।
प्रकट हुई माँ शारदे ,अष्ट सिद्धि ले हाथ ।।””
“”कर त्रिशूल डमरू लिए ,कोमल गौर शरीर ।
श्वेत वृषभ आसीन माँ, दूर करो भ भीर । “”
राष्ट्रीय प्रेम :- कवि महोदय की पुस्तक में राष्ट्रीय प्रेम को समर्पित भाव देखिए :-
“”इस मिट्टी को क्या मैं गाऊँ
कैसे इसका करूँ बखान
पैदा हुए इसी मिट्टी में,
राम कृष्ण और बुद्ध भगवान । “”
उपरोक्त भाषा शैली के अतरिक्त भी कवि की कई रचनाओं में रचनात्मक शैली के साथ साथ भक्तिमय भाव भी प्रबल प्रतीत है ।
“उद्गार” सिर्फ़ एक कविता, दोहे ,कुण्डलियाँ ,घनाक्षरी काव्य सग्रह नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दर्पण है, जिसमें अतीत की सौंधी गंध, वर्तमान की सच्चाई और भविष्य के लिए आशा का संदेश मिलता है। यह संग्रह नई पीढ़ी को अपने जड़ों से जोड़ने का प्रयास भी है। जो पाठक साहित्य में संवेदना, स्मृति और शुद्ध काव्यत्मकता की तलाश में हैं, उनके लिए यह संग्रह एक अनमोल धरोहर है। श्री हंसराज सिंह हंस का यह प्रयास निश्चित रूप से साहित्य जगत में एक सशक्त और स्थायी छाप छोड़ेगा। मेरी ओर से श्री हंसराज सिंह हंस जी को आकाश धरा भर शुभ मंगलकामनाएं ।
डॉ अमित कुमार बिजनौरी
कदराबाद खुर्द स्योहारा
जिला बिजनौर उत्तर प्रदेश
नव साहित्य परिवार भारत
संस्थापक/ नव साहित्य ई पत्रिका संपादक