Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
29 Jul 2025 · 1 min read

क्या चारदीवारी को ही घर कहते है?

क्या चारदीवारी को ही घर कहते है?
शायद नही!
ईंट गारे और पत्थर से बनी चारदीवारी,
निर्जीव खड़ी सिसकती दीवारें लिए लाचारी,
मकान तो है, पर घर नही कहलाता,
जब तक न हो अपनेपन का अहसास,
स्नेह की बयार और बच्चों की किलकारी।।

चारदीवारी में घिरा निर्जन मक़ान,
खँडहर सा पड़ा वीरान,
रसहीन मरुस्थल सा सूना आँगन,
न कोई शोर न छनकती पायल का गान,
मक़ान तो है, पर घर नही कहलाता,
जब तक न हो आपसी नोक-झोंक,
छोटों को प्यार और बड़ों का सम्मान।।

पलते हों जहाँ सपने,
मिलजुल कर रहते हों अपने,
प्रेम की सरिता रहे सदा गतिमान,
सुकून के पल और मर्यादा का भान,
चारदीवारी में घिरा मक़ान,
तब सही मायने में बन जाता है घर,
हँसता खिलखिलाता अपना घर।।

#स्वरचित एवं मौलिक रचना
#डा. राम नरेश त्रिपाठी ‘मयूर’

Loading...