दोहा मुक्तक .. .
दोहा मुक्तक .. .
जलते-जलते बुझ गई, आख़िर अंतिम आग।
शेष रहे शमशान में, बीते कल के राग ।
लौट गए सब छोड़ कर, अपने-अपने गाँव –
चिथड़े- चिथड़े हो गए, जीवन के अनुराग।
सुशील सरना / 29-7-25
दोहा मुक्तक .. .
जलते-जलते बुझ गई, आख़िर अंतिम आग।
शेष रहे शमशान में, बीते कल के राग ।
लौट गए सब छोड़ कर, अपने-अपने गाँव –
चिथड़े- चिथड़े हो गए, जीवन के अनुराग।
सुशील सरना / 29-7-25