इंक़िलाब
कर बुलंद अपनी आवाज तू तेरी आवाज में अभी
बहुत दम है ,
कर तू साबित तेरी बाज़ुओं में अभी
बहुत दम- ख़म है ,
मत समझ तू दुश्मनों के
नापाक इरादे कम हैं ,
तेरा नामो निशाँ मिटाने की
उनकी कोशिश हरदम है ,
ये तेरी जोशे जवानी की हस्ती ,
सरफरोशी की ये मस्ती ,
क्या किसी से कम है ?
तू जो चाहे लहलहाते खेत बना दे
इन बंजरों में ,
और बहते दरिया बना दे सहरा के
इन सराबों में ,
जगमगा दे गोशा -गोशा
इन घुप अंधेरों में ,
ग़र कोई बिछाए राह में जानकार रोढ़े कभी ,
अपनी हिम्मत की ठोकर से दूरकर तू उन्हे सभी ,
मिटा कर रख दे तू उन नापाक इरादों को ,
कर दे खाक हैवानियत के उन अंदाजों को ,
तेरे जज़्बे का क्या मुकाबला करेगा
इन ज़ालिमों का क़हर ,
काँपेंगी शैतानी रूहें , थरथराएगा ज़र्रा – ज़र्रा जब होगा तेरी बग़ावत का असर ,
और फिर आयेगा तूफान जो मिटाकर रख देगा
इन ज़ालिमों की हस्ती,
‘उरूज होगा तब उफ़क से अम्न का मेहर
फिर हर सम्त चैन होगा और खुशहाली की मस्ती।