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29 Jul 2025 · 1 min read

इंक़िलाब

कर बुलंद अपनी आवाज तू तेरी आवाज में अभी
बहुत दम है ,
कर तू साबित तेरी बाज़ुओं में अभी
बहुत दम- ख़म है ,

मत समझ तू दुश्मनों के
नापाक इरादे कम हैं ,
तेरा नामो निशाँ मिटाने की
उनकी कोशिश हरदम है ,

ये तेरी जोशे जवानी की हस्ती ,
सरफरोशी की ये मस्ती ,
क्या किसी से कम है ?

तू जो चाहे लहलहाते खेत बना दे
इन बंजरों में ,
और बहते दरिया बना दे सहरा के
इन सराबों में ,
जगमगा दे गोशा -गोशा
इन घुप अंधेरों में ,

ग़र कोई बिछाए राह में जानकार रोढ़े कभी ,
अपनी हिम्मत की ठोकर से दूरकर तू उन्हे सभी ,

मिटा कर रख दे तू उन नापाक इरादों को ,
कर दे खाक हैवानियत के उन अंदाजों को ,

तेरे जज़्बे का क्या मुकाबला करेगा
इन ज़ालिमों का क़हर ,
काँपेंगी शैतानी रूहें , थरथराएगा ज़र्रा – ज़र्रा जब होगा तेरी बग़ावत का असर ,

और फिर आयेगा तूफान जो मिटाकर रख देगा
इन ज़ालिमों की हस्ती,
‘उरूज होगा तब उफ़क से अम्न का मेहर
फिर हर सम्त चैन होगा और खुशहाली की मस्ती।

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