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29 Jul 2025 · 1 min read

अनजान

सोहबतें बहुत कीं मगर फ़ितरत को
ना पहचान सके ,
इंसानिय्यत की नक़ाब में छुपी ख़ुदगर्ज़ी को
ना पहचान सके ,

आरज़ू बहुत थी मगर क़ुदरत को
ना जान सके ,
मंज़िलों की जुस्तुजू थी पर रहगुज़र
ना जान सके ,

हौसला तो बहुत था मगर आयद खतरों से
अनजान थे,
जज़्बात की रौ में बह निकले अंजाम से
अनजान थे ,

दानिश-मंद बनते थे वक़्त की करवट ना
पहचान सके ,
मंसूबे तो बहुत बाँधे मगर वक़्त को
ना बाँध सके ,

‘इबादत तो बहुत की मगर ख़ुदाई को
ना जान सके ,
खातिर जिनके क़ुर्बान हुए उनका अपनापन
ना जान सके ,

तालीम तो बहुत पायी मगर उसका ‘अमल
ना जान सके ,
अच्छे बनकर रहे मगर इन्सानिय्यत को
ना जान सके ।

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