हिंदी मीडियम
कभी वक्त था मैं भी डटकर,
रट्टा रोज लगाता था।
स्पेलिंग त्रुटि हो जाने पर,
हाथ पे डंडे खाता था।
मर मर करके थोड़ा ज्यादा,
मैं भी इंग्लिश जान गया।
कुछ तो अप टू डेट हो चला,
खुद को जेंटल मान गया।
लेकिन बोल सका न अब तक,
इंग्लिश बहती धारा में।
अंग्रेजी के बीच फंसा था,
पाया नहीं किनारा मैं।
अंग्रेजी ही सबसे बढ़िया,
यही विचार धमकता था।
जबकि हिंदी में एम ए हूं,
पर उसे निम्न समझता था।
बीता समय समझ कुछ उपजी,
उगी ज्ञान की बिंदी।
जिस भाषा से मिली नौकरी,
वह थी अपनी हिंदी।
हिंदी रोजी रोटी दे गयी,
इंग्लिश दिया निराशा।
मैंने कहा सुनो भई सृजन,
छोड़ पराई भाषा।
जब तक इंग्लिश से प्रीती थी,
खुद से थी तकरार।
हिंदी ने सम्मान दिया खुब,
धन पद जन का प्यार।
अब तो मेरे मन को भाये,
हिंदी भाषा हिंदुस्तान।
इसमें ही है जीना मरना,
हिंदी अब है मेरी शान।
हिंदी की नैसर्गिक बगिया,
अत्यानंद भर जाती है।
अंग्रेजी की चकाचौंध अब,
कतई नहीं लुभाती है।
हिंदी के कुछ शब्द बटोरे,
जो बन गई थी कविता।
तब से मेरे नवजीवन में,
जगा साहित्य का सविता।
हिंदी मुझको इतना दे दिया,
व्यक्तित्व में बढ़ गया वजन।
तब तो मैं था ‘मिस्टर एस.के.’
अब कहलाऊं ‘सतीश सृजन’।
इंग्लिश भाषा भी अच्छी है,
उसमें भी न कोई खोट।
लेकिन हिंदी मां सम लगती,
सो जा बैठा हिंदी ओट।
हिंदी बनी इबादत जैसी,
हिंदी बन गयी मेरी शान।
हिन्दी लिखता पढ़ता सुनता,
हिंदी पर मुझको अभिमान।