ज़िन्दगी भी इस इल्म
ज़िन्दगी भी इस इल्म में ख़ाक हो गई,
जब मजबूरी हालात हो गई।
बेंचने वाले को भी शहर की नब्ज़ का पता था,
इसलिए शराब की दुकानें बेहिसाब हो गई।
बेवफ़ाई के दौर में हर कोई इस बारिश में भीगना चाहता है,
इसलिए वफ़ा की कसमें अब बर्बाद हो गई।
देखा जाए तो एक बूंद के वजूद में भी समंदर है,
वरना शबनम की बूंदों की बस पत्तों तक बिसात रह गई।
कौन जाने कब किस मोड़ पर करवट ले ये ज़िन्दगी,
तब तक यारों ग़म और खुशी दोनों से अपनी बात हो गई।