Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
29 Jul 2025 · 1 min read

तलाश

“नंदिनी खाने में कितनी देर है? भूख लग रही है।” सुधीर ने टीवी ऑन करते हुए पत्नी से पूछा।
नन्दिनी तुनक कर बोली,”बाहर से मंगवा लीजिए। मुझसे इतनी गर्मी में खाना नहीं बनेगा। शीघ्र कोई नौकर तलाश कीजिए।”
सुधीर खीजकर बोला, “कहाँ से लाऊँ हर सप्ताह नया नौकर? दो का खाना भी नह बनता तुमसे; न नौकर ही संभलते। अभी हफ्ता भर पहले ही तो आया था।”
नन्दिनी बोली, “तो क्या करूँ? मैंने नहीं भगाया उसे। ठीक से काम नहीं करता था, थोड़ा डाँट दिया तो भाग गया। कल तुम्हारी माँ भी आ रही है, कौन काम करेगा इतना?”
“माँ कितना खा लेगी नन्दिनी, कैसी बातें कर रही हो? माँ छः लोगों का भोजन बनाया करती थी। कोई नौकर नहीं था हमारे घर में।
नन्दिनी नौकर भी इंसान ही होते हैं। ठीक से पेश आया करो उनके साथ। नौकर मिलते कहाँ हैं आसानी से।” सुधीर ने कहा।
नन्दिनी -“अच्छा ठीक है कल सासू जी आ ही रही हैं; मुझे पीहर जाना है बहन के विवाह की तैयारी करनी है। शॉपिंग करवानी है, तब तक माजी घर संभाल ही लेंगी। उनको तो आदत है काम करने की। आप आराम से नौकर तलाश कर लेना और मुझे खबर कर देना।”
सुधीर बुदबुदा रहा था, हे प्रभु! ये नौकर की तलाश कभी खत्म भी होगी या नहीं। सुधीर ने फोन उठाया और खाने का ऑर्डर करने लगा।

-गोदाम्बरी नेगी ‘पुण्डरीक’
हरीद्वार(उत्तराखंड)

Loading...