मुखड़ा
मुखड़ा
ढक ले अपने जख्म रे पगले , मक्खियां बहुत बाजार में।
सहला सहला ये बरगलाते, स्वाद रखाते आचार में।।
अंतरा 1
चेहरा छिपाए है मुखौटा, कुटिलता लिए मुस्कान में
बात बात में हो प्रतिज्ञा , षडयंत्र रखे अरमान में।
मुर्ख बनाये जगत ये हरदम, सहानुभूति लिए किरदार में।
सहला सहला ये बरगलाते, स्वाद रखाते आचार में।।
अंतरा 2
रिश्ते नाते जगत ये सारे, है स्वाद प्रमादी खुमार रे
चकाचौंध में जो खो सदा से, मरते भटके बीमार रे
खोल पहन सब निज की छुपाएं, दुर्गंध सदा संसार में
सहला सहला यवरगलाते, स्वाद रखाते आचार मे।।
संजय निराला