Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
29 Jul 2025 · 1 min read

मुखड़ा

मुखड़ा
ढक ले अपने जख्म रे पगले , मक्खियां बहुत बाजार में।
सहला सहला ये बरगलाते, स्वाद रखाते आचार में।।

अंतरा 1
चेहरा छिपाए है मुखौटा, कुटिलता लिए मुस्कान में
बात बात में हो प्रतिज्ञा , षडयंत्र रखे अरमान में।
मुर्ख बनाये जगत ये हरदम, सहानुभूति लिए किरदार में।
सहला सहला ये बरगलाते, स्वाद रखाते आचार में।।

अंतरा 2
रिश्ते नाते जगत ये सारे, है स्वाद प्रमादी खुमार रे
चकाचौंध में जो खो सदा से, मरते भटके बीमार रे
खोल पहन सब निज की छुपाएं, दुर्गंध सदा संसार में
सहला सहला यवरगलाते, स्वाद रखाते आचार मे।।
संजय निराला

Loading...