*"बरसात की भुट्टा-रागिनी"*
बारिश गिरी, धरा भीगी, बूँदें गाएं राग,
मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू दे, सजीव करें फाग ।।
बादल गरजे नभ के कोने, बिजली करे नृत्य,
हरियाली की ओढ़ चादर, धरती बोले सत्य ।।
छपछप करती गलियाँ सारी, पानी की है धुन,
नंगे पाँव दौड़े बच्चे, हर्षित हर एक जन ।।
ताल तलैया, नदियाँ उफने, मेघों का उपहार,
मन मयूर-सा झूमे जग में, ये ऋतु हमें लगे अपार ।।
कोने में ठेले पर बैठा, भुट्टे वाला भाई,
अंगारे पर सिकती मक्की, देख आँखों में चमक आई ।।
नींबू-नमक संग मसाले, संग धुआँ सुगंध,
हाथ में भुट्टा थामे हम, भूले जग के बंद ।।
ओठों से जब लगे भुट्टे, स्वाद लगे चटकार,
मन में मीठी स्मृतियाँ जागें, होंठ करें सत्कार ।।
संग प्रियतम या अकेले, ये क्षण हो अनमोल,
गरमी भरे उस भुट्टे में, छिपा सर्दियों के बोल ।।
सावन की इस रागिनी में, जीवन गाता गीत,
सौंधी माटी, भीगी गलियाँ, और भुट्टे की प्रीत ।।
हे वृष्टि! यूँ ही बरसती रह, दिल में भर विश्वास,
भुट्टा, बूँदें, और बचपन — यही है जीवन-रास ।।