कतरा कतरा वक़्त बरफ सा पिघल रहा है
कतरा कतरा वक़्त बरफ सा पिघल रहा है
बे आवाज जिदंगी का डोला खिसक रहा है
कल ही काफिला निकला हो लगता यही है
धीरे धीरे लगता सफर ये निबट रहा है
बसते बसते लगा था हमेशा को बस गए है
इस कथा का अब आखिरी कथ्य चल रहा है
जलसा मनाते चलना आखिरी दौर ये है
हर कोई कारवां में बस आगे बढ़ रहा है
दिल में जिंदगी की लौ का जला कर रखना
हर दम ये जीवन बाट तेरी जोह रहा है
डॉ राजीव “सागरी”