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28 Jul 2025 · 1 min read

कतरा कतरा वक़्त बरफ सा पिघल रहा है

कतरा कतरा वक़्त बरफ सा पिघल रहा है
बे आवाज जिदंगी का डोला खिसक रहा है

कल ही काफिला निकला हो लगता यही है
धीरे धीरे लगता सफर ये निबट रहा है

बसते बसते लगा था हमेशा को बस गए है
इस कथा का अब आखिरी कथ्य चल रहा है

जलसा मनाते चलना आखिरी दौर ये है
हर कोई कारवां में बस आगे बढ़ रहा है

दिल में जिंदगी की लौ का जला कर रखना
हर दम ये जीवन बाट तेरी जोह रहा है

डॉ राजीव “सागरी”

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