युद्ध ,प्रेम और लाचार हो गए हैं।
युद्ध, प्रेम और लाचार हो गए हैं।
बेहद नाजुक हालत हो गए हैं।
जज्बात शब्दों के मोहताज हो गए हैं।
ये नस्ल प्रेम के बिना ही बर्बाद हो रहे हैं।
और युद्ध से लाचार हो गए।
अहंकार और स्वार्थ मिटता नहीं।
विध्वंसक वार झेलती धरा (पृथ्वी)
घायल लाचार जिंदगी
प्रेम के लिए मोहताज हो गए है।
पर्यावरण क्षति अलग हैं।
खाना – पीना, दवा सब नकली होते जा रहे हैं।
व्यक्तित्व ही बीमार हो रहा है।
दरअसल व्यक्ति गैर – जिम्मेदार हो गए हैं।
मुसीबतों में अपने को डाल रहे हैं ।
अपूर्णनीय क्षति में अपने को ढकेल रहे हैं।
बता क्या बचा रहे हैं।
——- डॉ . सीमा कुमारी,27-7-025की स्वरचित रचना है मेरी जिसे आज प्रकाशित कर रही हूं।