शाम
शाम
को कुर्सी
पर बैठकर सोचता हूं
क्या बेचैनी में मैंने ही अपने बाल नोचे है
पर
जब सड़कों पर लोगों को देखा गौर से तो किसी के सिर पर बाल नहीं थे ।
शाम
को कुर्सी
पर बैठकर सोचता हूं
क्या बेचैनी में मैंने ही अपने बाल नोचे है
पर
जब सड़कों पर लोगों को देखा गौर से तो किसी के सिर पर बाल नहीं थे ।