दोहा पंचक. . . . वक्त
दोहा पंचक. . . . वक्त
हर पर्दे में वक्त के, छिपी हुई है सीख ।
वक्त पड़े तो माँगता, राजा झुककर भीख ।।
बच कर रहना वक्त से, यह शूलों का ताज ।
इसकी तो लाठी सदा, होती बे-आवाज ।।
क्या जाने यह वक्त कब, बदले अपनी चाल ।
तोड़ न पाती जिंदगी, इसका निर्मम जाल ।।
नियत वक्त से पूर्व कब, होता इच्छित काम ।
जीवन की यह फलसफा , इसको करो सलाम ।।
पल भर की देता नहीं, वक्त किसी को भीख ।
अन्तिम क्षण की वक्त में, गुम हो जाती चीख ।।
सुशील सरना / 28-7-25