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28 Jul 2025 · 7 min read

*गरीब से सहानुभूति*

गरीब से सहानुभूति
बात अब से लगभग सात-आठ साल पहले की है। मैं और मेरे कई साथियों ने पीसीएस प्री का फॉर्म डाला था, जिसका एग्जाम सेंटर बरेली गया था। मैं, मेरे सहपाठी विनीत कुमार, राहुल कुमार, स्वतंत्र और एक साथी हितेश जो विनीत कुमार और राहुल कुमार जी के साथ इसी स्कूल में पढ़ाते थे, जिसमें यह दोनों साथी पढ़ाते थे। मैं उस समय प्राइवेट स्कूल में टीचिंग कर रहा था। जैसा कि आप सभी जानते हैं, कि हर किसी को रोजगार की चाहत होती है। इस कारण हम भी कुछ हल्की-फुल्की तैयारी कर रहे थे। स्वतंत्र जो हमारे गांँव के ही पास कस्बा उझारी का रहने वाला था और सभी साथी भी तैयारी कर रहे थे। मैं उस समय डायट बुढ़नपुर से बीटीसी करने के बाद घर पर ही था और इसलिए अपने गांँव की मोंटेसरी(पब्लिक स्कूल) में ही पड़ा रहा था। सौभाग्य से हम सब ने जो पीसीएस का फॉर्म भरवारा था, तो हमारा एग्जाम सेंटर सभी का एक साथ बरेली आ गया था। हम सब साथी साथ-साथ बरेली एग्जाम देने के लिए जा रहे थे। मेरी प्रकृति संवेदात्मक और भावात्मक अधिक है अर्थात जब मैं किसी दुखी व्यक्ति, जीव- जन्तुओं को देखता हूंँ, तो भावुक हो जाता हूंँ और उसके बारे में सोचने लगता हूंँ। कभी-कभी इस कारण मुझे घर पिताजी भाई और धर वालों की भी सुननी पड़ जाती है। वे हमेशा कहते हैं कि तुम दूसरों को अपने जैसा नहीं समझा करो। इतने पर भी मन नहीं मानता, हमेशा दूसरों की सहानुभूति के लिए तैयार रहता हूँ।
बरेली जाते हुए हम सब साथियों ने हंसी मजाक के साथ और अनुभवों को जो उनके साथ घटित हुए थे, सफर किया और सभी साथी अपने-अपने परीक्षा केंद्र को परीक्षा देने के लिए चले गए।
उधर से सारे साथी परीक्षा के बाद मोबाइल के माध्यम से एकत्रित हो गए। जिस दिन एग्जाम हुआ उस दिन रविवार था और सोमवार की भी छुट्टी थी। इसलिए मैं(दुष्यन्त कुमार) विनीत कुमार और राहुल कुमार ने लखनऊ घूमने का विचार बनाया। बाकी हमारे तीनों के अलावा दोनों साथी ने कहा कि हमारे घर पर काम है। हम वहांँ नहीं जाएंँगे इस कारण ये दोनों घर वापस आ गए।
जब हम लखनऊ जाने के लिए बरेली रेलवे स्टेशन पर रेलगाड़ी के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे तो तभी मैंने देखा कि वहांँ से पीछे जहांँ यात्रीगण विश्राम करते हैं वहांँ एक गरीब दिव्यांग व्यक्ति बहुत ही सुरीली ढोलक बजा रहा था। मैं काफी देर तक ढोलक की ध्वनि को सुनता रहा। उस सुरीली ढोलक की ताल को सुनने में मुझे बहुत आनंद आ रहा था और मन ही मन सोच रहा था क्या कला है! कुछ देर तक इस सुरीली आवाज को सुनने के बाद मैंने उसके पास जाने का निश्चय किया, कि देखते हैं वहां कौन इतनी अच्छी ढोलक बजा रहा है। जहांँ काफी सारे लोग उसे घेरकर खड़े हुए थे। मेरे दोनों साथी विनीत कुमार और राहुल कुमार वहीं खड़े रहे जहांँ खड़े थे और मैं उस व्यक्ति के पास चला गया जो ढोलक बजा रहा था।
जब मैं वहांँ पहुंँचा तो देख कर दंग रह गया कि कैसे एक दिव्यांग व्यक्ति जिसके दोनों हाथ और दोनों पैर नहीं थे, अपनी कला का प्रदर्शन ढोलक के रूप में कर रहा था। उसके चारों ओर लगभग 20-25 लोग इस कला को बड़ी तल्लीनता के साथ देख रहे थे। मैं भी इस ढोलक बजाने वाले दिव्यांग व्यक्ति की कला को देखकर हैरान था, कि प्रकृति किसी में कुछ गुणों का समावेश करती है, तो उससे कुछ न कुछ छीन क्यों लेती है? मुझे देखते हुए लगभग 5 मिनट हो चुके थे। मुझे उस व्यक्ति पर बहुत दया आने लगी क्योंकि वहांँ खड़े व्यक्तियों में से किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हुई, कि उसे अपनी जेब से निकाल कर ₹5 भी उसके हाथ पैर रख सकें। मुझे उससे बहुत सहानुभूति होने लगी। वह बिना किसी से कुछ मांँगे अपने प्रदर्शन में लीन था और साथ ही अपनी मधुर आवाज में कोई गीत भी गा रहा था। उसका एक-एक शब्द मानों दिल पर गम की चोट कर रहा था। मैं इस दृश्य को देखकर भावुक हो गया और सोचने लगा कि प्रकृति पता नहीं क्यों कुछ लोगों को ऐसा बनती है, जो दूसरों के सहारे होते हुए भी कभी किसी से मुँह खोलकर कुछ नहीं मांँगते?
मैं उसकी इस कला को देखकर एक तरफ तो यह कह रहा था, कि प्रकृति ने इसे कितनी अच्छी गाने और बजाने की कला दी है और दूसरी तरफ यह भी सोच रहा था, कि इस व्यक्ति को ऐसा क्यों मनाया है, जो दूसरे के भरोसे जीवन यापन कर रहा है और अपनी कला का प्रदर्शन बिना किसी से कुछ मांँगे कर रहा है?
मैंने सोचा कि कहीं-कहीं तो बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं, जो दूसरों पर बिना मांँगे ही पैसा लुटाते रहते हैं, मगर जहांँ पैसे की वास्तविक जरूरत है वहांँ कोई भी उसे पैसा देने को तैयार नहीं था। मैं उस व्यक्ति की पैसे के माध्यम से कुछ सहायता करना चाहता था, लेकिन मेरे पास भी इतने ही पैसे थे, जिससे मैं लखनऊ घूम कर वापस घर आ सकूंँ। मैं कुछ देर तक सोचता रहा फिर अचानक मेरे मन में विचार आया कि क्यों न यहांँ खड़े सभी लोगों को पैसा देने के लिए प्रेरित किया जाए, जिससे उस व्यक्ति का कुछ भला हो सके जो दिव्यांँग अपनी कला का बहुत अच्छे से प्रदर्शन उन सब लोगों के समक्ष कर रहा था। मैंने उन सब लोगों से कहा, कि कोई गरीब व्यक्ति अपनी क्वालिटी और कला को आप सबके सम्मुख दिखा रहा है, मगर आप में से किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हुई जो इसकी कोई सहायता कर सके? क्या किसी के पास 5-10 रुपए इस व्यक्ति को देने के लिए नहीं है? मैंने बहुत से लोगों को देखा है जो नचनियों पर बहुत सारे पैसे बिना मांँगे ही उड़ाते हैं। अगर यहांँ दो-चार नाचने वाली और बदन दिखाने वालीं होती तो आप सब लोग पैसों का ढेर लगा देते। मगर अफसोस! आप इस बेसहारा और गरीब को ₹5 नहीं दे सकते। यह सब हमारी सोच और समझने का फेर है। अगर आप उसे पांँच-पांँच, दस-दस देंगे तो इसका भला हो जाएगा। ऐसे लोगों को ही दान दिया जाए, ऐसे लोगों को ही दान की वास्तविक आवश्यकता होती है। अगर आप इसको कुछ दोगे तो प्रकृति भी आपको कुछ कहीं न कहीं देगी। वास्तव में हमें ऐसे लोगों की ही सहायता करनी चाहिए। वहांँ मैंने यह भी कहा, कि ऐसा नहीं है कि पैसा केवल इसे ही दिया जाए बस ऐसे लोगों को दान देना ही सच्चा दान है।
उपरोक्त बातों को वहांँ खड़े सभी लोगों ने बड़े ध्यान से सुना और बहुतों ने हांँ में हाँ मिलाई। उनके भीतर उस गरीब के लिए सहानुभूति जाग चुकी थी। उनमें से अधिकतर ने अपनी-अपनी जेब से रुपए निकाले और उस दिव्यांँग व्यक्ति को देने लगे। मैं समझ चुका था कि अब चिंगारी लग चुकी है और अब एक दूसरे को देखकर अधिकतर व्यक्ति इसकी सहायता करेंगे। देखते ही देखते किसी ने ₹5 किसी ने ₹10 और किसी ने ₹20 उस व्यक्ति को खुश होकर दिए। मैं यह देखकर बहुत खुश हुआ कि कम से कम इन लोगों पर मेरी बात का असर हुआ और मेरी बजह से उस गरीब की कुछ सहायता हो सकी और वहांँ उपस्थित सभी लोगों ने इस गरीब के प्रति सहानुभूति दिखाई। कुछ समय बाद मैं यह दृश्य देखकर वहांँ से वापस आ गया और यह सारा देखा हाल अपने साथियों को बताया। उन्होंने भी मेरे इस कार्य की प्रशंसा की।
इसके बाद हम सब तीनों साथी लखनऊ को चले गए और वहांँ हमने कई दर्शनीय ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण किया। मुझे पूर्व मुख्यमंत्री बहन कुमारी मायावती जी द्वारा बनवाए गए बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर परिवर्तन स्थल ने सबसे अधिक प्रभावित किया। इसे देखने के बाद ऐसा लगा कि कुछ ऐसी ही विरासतें होती है, जो इतिहास को जिंदा रखने का कार्य करती है।इसके बाद हम जनेश्वर मिश्र पार्क गए जो पहले बाबा डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी के नाम से ही बनवाया जा रहा था। बहन कुमार मायावती जी के सरकार जाने के बाद अखिलेश जी की सरकार ने इसका नाम जनेश्वर मिश्र पार्क रख दिया था। यह एशिया का सबसे बड़ा पार्क है, जिसे हमने देखा बहुत ही अच्छा प्राकृतिक दृश्य का मुआयना किया और और इसका आनंद लिया। इसके बाद हम राम मनोहर लोहिया जी के पार्क में गए जहांँ हमने पेड़ों के नीचे कुछ लड़के और लड़कियों को एकांत में बातें करते हुए और अठखेलियांँ करते हुए देखा। इसके बाद हम इमामबाड़ा देखने गए परंतु उस दिन वह खुला नहीं था। वापस लौटने के बाद हमें पता चला कि लखनऊ का चिड़ियाघर बहुत बड़ा और खूबसूरत है। हमने चिड़ियाघर में रंग-बिरंगे पक्षी, कई तरह के सांँप, चिड़ियांँ, कई प्रकार के बंदर, शेर, चीता, भालू हिरण, जिराफ और अनेक प्रकार की रंग- बिरंगी मछलियांँ देखीं। यह चिड़ियाघर देखकर ऐसा लग रहा था, कि लगातार देखते रहो लेकिन हम थक चुके थे पर मन अब भी घूमने को कर रहा था। हमें वापस घर भी आना था, क्योंकि अगले दिन स्कूलों की छुट्टी नहीं थी। इतना सब देखने और कुछ सामान खरीदने के बाद हम तीनों घर वापस आ गए।
आज भी जब हम उस पल को याद करते हैं, तो ऐसा लगता है मानों जैसे सब- कुछ आज ही देखकर आए हों। कुल मिलाकर हमने वास्तविक ज्ञान इस घटना से अर्जित किया और एक गरीब व्यक्ति से सहानुभूति के कारण उसका कुछ भला हो गया। हमें ऐसे व्यक्तियों की मदद जरूर करनी चाहिए जो दूसरों के सहारे हैं, ऐसा नहीं है कि केवल हम रूपए पैसे से ही सहायता कर सकते हैं और भी अनेक रास्ते हैं, जहांँ हमारी उन्हें जरूरत है।

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