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28 Jul 2025 · 1 min read

हे अल्हड़ मन, संभल जरा....!

” हे अल्हड़ मन संभल जरा….
चलते चलते कुछ सोच और ठहर जरा…!
ये अल्हड़ मन, कभी संभलता नहीं…
बह जाता है, भावनाओं में…!
मचल जाता है, कभी आकर्षण की ताने बाने में…
उचक जाता है, कुछ तुच्छ लालसाओं में…!
और तय कर लेता है, वो लंबी राहें…
होती है जो, मृग मरीचिका सी निगाहें…!
अनजान अनायास ही, कदम बढ़ा लेता है…
आगे बढ़ जाने का…!
उन राहों पर, जो विकल्प नहीं देता कभी,
लौट आने का…!
अवसर नहीं देता कभी,
पुनः संभल जाने का…!
कदम कदम पर, पहले पहल ये मन…
सुंदर सपनों के हांक लेता है
बातों-बातों में ही, विजयी पथ चुन लेता है…
परिणाम, विचारों के अनुरूप ही महसूस होता है…!
मगर अल्हड़ मन का चंचल सफर…
बिन सुझबूझ का अनजान डगर…!
केवल और केवल…
हताहत व प्रतिकुल परिणाम देता है…!
गुमराह का डगर…
आसान और सरल होता है…!
नहीं मिलता राह, पुनः लौट आने का…
जिस पथ पर, आगे बढ़े थे…!
थका देता है मन को….
जिस पथ पर सपनों के रथ चल रहे थे…!
हे अल्हड़ मन तू हो किनारा…
चकाचौंध की ताने बाने से…!
तू ले सहारा, सही चुनाव का…
जीवन कभी विकल्प देता नहीं,
पुनः लौट आने का…!
जैसे लौट आती है चिड़िया…
जैसे लौट आता है सुबह का भूला,
सांझ ढलने पर अपने घर…
और ढूंढ लेता है एक नया अवसर…!
हे अल्हड़ मन संभल जरा…
चलते चलते कुछ सोच और ठहर जरा…! ”

*******©*******

* बी पी पटेल
* बिलासपुर (छ.ग.)

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