सोमदेव मस्तक धरें, जटा लपेटे गंग।
सोमदेव मस्तक धरें, जटा लपेटे गंग।
विषधर लिपटाएँ गले, सती विराजे संग।।
अर्धनारीश्वर शिव हैं, सकल सृष्टि के मूल।
अविनाशी शंकर सदा, हरण करें हर शूल।।
निराकार साकार हैं, जग को देते रीत।
महाकाल की सौम्यता, सिखलाती है प्रीत।।
क्षमा याचना मांँगते, बतलाकर निज भूल।
श्रद्धा भक्ति “पाठक” रखें, करते मन निर्मूल।।
:- राम किशोर पाठक (शिक्षक/कवि)