राजकुमार ( कहानी अंतिम क़िश्त )
[29/11/2024, 7:32 am] Sanjay Dani: —–राजकुमार—–[ कहानी ___ प्रथम क़िश्त ]
राजकुमार गुप्ता की प्रवृति पूर्णत: नाम के अनुरूप थी । उसके खान पान , बात चीत , पहनावा , चलने का ढंग और हेयर स्टाइल में भी खूब रईसी झलकती थी । वह घर के नौकर चाकर और सड़क पर चलने वाले सामान्य जनों को कीड़ों मकोड़ों से जियादा नहीं समझता था। राजकुमार की मम्मी मायादेवी किटी पार्टी में ही व्यस्त रहती थी वहीं उसके पिताजी को अपने सोने चांदी के व्यापार से ही फ़ुरसत नहीं मिलती थी । नौकरों के भरोसे ही राजकुमार का बचपन गुज़रा था और वह उन्हीं के भरोसे जवान हुआ था ।
राजकुमार के घर में पैसों की कमी तो थी नहीं , न ही कोई उसे रोकने टोकने वाला था । वह पूरी तरह से बिगड़ चुका था । रात को शराब के नशे में रैस ड्राइविंग करते वक्त वह पिछले कुछ वर्षों में कई लोगों को अस्पताल पहुंचा चुका है पर पोलिस वालों को खरीद कर वह कानूनी शिकंजे से अब तक बचा हुआ है।
ऐसी ही एक गर्मी की रात 2 बजे राजकुमार क्लब से नशे की हालात में घर लौट रहा था । रिंग रोड 2 पर उसके सामने एक मोड़ आया और वह जैसे ही अपनी कार को मोड़ा सामने से एक रिक्शा चला आ रहा था । उस रिक्शे को एक नवजवान जिसका नाम मृत्युन्जय था वह चला रहा था और रिक्शे की सीट पर उसके पिताजी बैठे थे । रिक्शा जैसे ही राजकुमार की कार के पास पहुंचा पता नहीं क्या हुआ कि राजकुमार की कार लहरा कर मृत्युन्जय के रिक्शे के ठीक सामने आ गई और रिक्शे को टक्कर मारकर कुछ दूर जाकर खड़ी हो गई । कार का इंजन वैसे ही चालू था । उधर रिक्शा पूरी तरह से तहस नहस हो गया था । मृत्युन्जय की छाती पर अच्छी खासी चोट लगी थी वहीं उनके पिताजी सही सलामत थे । राजकुमार ने एक नज़र उठाकर देखा तो उसे रिक्शे के पीछे लिख शब्द दिखा जहां पर लिखा था मृत्युन्जय निषाद। राजकुमार ने दोनों व्यक्तिओं को अच्छे से देखा और फिर अपनी कार को अपने घर की ओर दौड़ा वहां से रफ़ूचक्कर हो गया । उधर मृत्युन्जय बुरी तरह घायल हो चुका था । उसका रिक्शा क्षतिग्रस्त हो चुका था । उसकी स्थिति देखकर उसके पिता मेघनाथ कांप गये। इस बीच वहां से 10/12 गाड़ियां गुज़रीं पर किसी गाड़ी वाले ने रुककर उन्हें मदद पहुंचाने का प्रयास नहीं किया ।
इस तरह एक घंटा गुज़र गया मेघनाथ अपने बेटे मृत्युन्जय के सिर को अपनी गोद पर लिए बैठे रहा । धीरे धीरे मृत्युन्जय की सांसे थमते गई और कुछ देर के बाद उसका शरीर निष्प्राण हो गया । बूढा बाप यूं ही सदमें में बेटे के निर्जीव शरीर को लिए बैठे रहा । अब दुनिया में मेघनाथ अकेला रह गया था ।
अगले दिन रायपुर शहर के अधिकांश अखबारों में इस बाबत बहुत छोटा सा समाचार छपा था । उधर दोपहर 1 बजे जब राजकुमार सोकर उठा तो उसकी नज़र भी अखबार के उसी समाचार पर पड़ी । उसके चेहरे पर कोई ऐसे भाव परिलक्षित नहीं हुए जिससे लगे कि उसे कोई ग्लानि या दुख है।
शाम को 6बजे वह उठा तो वह मानो सब कुछ भूल चुका था और वह फिर अपने ही रंग में दिखने लगा । अगले दिन उसने रिक्शेवाले का घर पता लगवा कर मृत्युन्जय के पिता को अपने नौकर के हाथों 2 लाख रुपिए भिजवाए पर मेघनाथ ने पैसा लेने से मना कर दिया। राजकुमार को पता चला कि मेघनाथ ने पैसे लेने से मना कर दिया है तो उसे अश्चर्य के साथ दुख भी हुआ और गुस्सा भी आया कि कैसे एक अदना सा रिक्शा के भरोसे गुज़र बसर करने वाला व्यक्ति उसके पैसों को ठुकरा सकता है । बात आई और गई । 2 महीने बीत गए। राजकुमार रिक्शा से हुई दुर्घटना के बारे में सारी बातें भूल गया ।
नवंबर की ठंडी रात थी । आज राजकुमार रात्रि 2बजे फिर नशे में क्लब से घर लौट रहा था । तभी उसकी कार एक मोड़ पर लहराई और किनारे लगे पेड़ से टकरा गई । राजकुमार के सीने पर गहरी चोट आई थी । उसका मोबाइल भी चूर चूर हो गया था । उसके दाएं पैर से खून का तेज़ी से रिसाव हो रहा था । वह थोड़ी देर तक कार से बाहर निकलने की असफ़ल कोशिश करता रहा । फिर वह बेहोश हो गया ।
[ क्रमश; ]