काग़ज की नौका बनी, चंचल मन पतवार।
काग़ज की नौका बनी, चंचल मन पतवार।
मांझी जग डोलत फिरे, कौन लगाए पार।।
कौन लगाए पार, झूठ की मोह नगरिया,
ढलके-छलके मूढ़, अध नीर भरी गगरिया।
बात सत्य यह मान, बनी यह काया रज की,
जल से गल मिट जाय, नाव तेरी काग़ज की।।
-गोदाम्बरी नेगी ‘पुण्डरीक’
हरिद्वार उत्तराखंड