दोहा पंचक. . . . विविध
दोहा पंचक. . . . विविध
पूरी कब मन की हुई, मनचाही हर बात ।
मन ही मन देते रहे, सपनों को हम मात ।।
मौन हुई कब कामना, पल -पल बढ़ती जाय ।
इसके मोहक जाल से , प्यासा कब बच पाय ।।
उर के सपने उड़ गए, व्याकुल नयन कुटीर ।
स्वप्न विला सूनी हुई, अविरल बहता नीर ।।
व्याकुल मन का पालना, मौन विरह की पीर ।
उस बैरी के स्वप्न से, मिला नयन को नीर ।
सपने तो निष्ठुर सभी, भरें नयन में नीर ।
साजन रूठा मीत से, रूठ गई तकदीर ।।
सुशील सरना / 26-7-25