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27 Jul 2025 · 1 min read

दोहा पंचक. . . . विविध

दोहा पंचक. . . . विविध

पूरी कब मन की हुई, मनचाही हर बात ।
मन ही मन देते रहे, सपनों को हम मात ।।

मौन हुई कब कामना, पल -पल बढ़ती जाय ।
इसके मोहक जाल से , प्यासा कब बच पाय ।।

उर के सपने उड़ गए, व्याकुल नयन कुटीर ।
स्वप्न विला सूनी हुई, अविरल बहता नीर ।।

व्याकुल मन का पालना, मौन विरह की पीर ।
उस बैरी के स्वप्न से, मिला नयन को नीर ।

सपने तो निष्ठुर सभी, भरें नयन में नीर ।
साजन रूठा मीत से, रूठ गई तकदीर ।।

सुशील सरना / 26-7-25

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