ग़ज़ल...है ज़िन्दगी तो हम भी
है ज़िंदगी तो हम भी , आबाद हैं जहाँ में,
नादान लोग समझे , बरबाद हैं जहाँ में।
मासूम सी कली का , हर फूल से है रिश्ता ,
सोने की अंजुमन सा, शहज़ाद है जहाँ में।
फ़ुरसत से ढूंढता है , पत्थर में कुछ नगीने,
करते हैं याद कह कर,सिंदबाद है जहाँ में ।
उजड़ी हुई सी बस्ती, खुशहाल दिख रही है,
साया बना के रक्खा, शमशाद है ज़हाँ में ।
ग़ुर्बत के वक़्त ,करते थे सब्र आसमाँ सा,
जीते हैं वो कलंदर , तादाद है जहाँ में ।
खट पट जो कर रहे हैं, गिर गिर के मर रहे हैं ,
है सोच जिनकी अच्छी , आज़ाद है जहाँ में ।
कहती है नील मुझसे , सूना है क्यूँ घराना ,
बाज़ार जब से बिगड़ा , नाशाद है जहाँ में ।
✍️ नील रूहानी..