हमे अपनी जिद में रहने दो
राह मेरी सुनी हो गयी, बिन तेरी मनुहार के
आह मेरी सूनी हो कही,जिद मेरी पुकार के
थाह कराकर खो गयी वो ,अपने मन को लाचार जानकर
खुद से खुद कहने लगी वो , हमें अपनी जिद में रहने दो
खात मेरी सुनी हो गयी,खामोशी तेरी भापकर
बात मेरीअधुरी हो गयी, लाचारी मेरी जानकर
लब्ज मेरे लिख रहा हूं टूटी रखी कलम से
मित मेरी कह रही है ,हमें अपनी जिद में रहने दो
स्वार्थ तगारी डाल रहा हूं, अपने मन के चाप से
मनोरथ मन का भाप रहा हूं, अपने मन के राग से
अनुराग मेरा भाग रहा है देख मन के हालात को
मन अपने आवेग में कह रहा हमें अपनी जिद में रहने दो
जलते चिराग को बुझा रहा हूं ,अंधकार की छाव में
बिन पादुका के घुमा रहा हूं, मनोताप के दाव में
घबरा रहा वो आज उठाकर बिन मेहनत के भाव को
ना चाहकर भी कह रहा है हमें अपनी जिद में रहने दो
भरत कुमार सोलंकी