तृष्णा विश्राम भी ले अब तो
तृष्णा विश्राम भी ले अब तो
सुख शांति मिले जिससे मन को
यदि तृप्त हुई ना हो अब भी
तो कर समाप्त इस जीवन को
ऐ तृष्णा तेरी बुराई है
हर जन मन में तू समाई है
तू बड़ी बहन लोभ भाई है
तेरा बाप क्रोध कसाई है
हर ओर घंटा तेरी छाई है
तृष्णा तू बड़ी दुखदाई है
जब तक न ये भागती है
तब तक न आत्मा जागती है
तृष्णा के बस जो रहता है
हर कष्ट वो जग में सहता है
प्राणी जाग जगा अंतर्मन को
जप-तप कर भज परमात्मन को
रमेश चंद्र ‘उदास’