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27 Jul 2025 · 4 min read

विरासत के अक्षर

मई की तपती दोपहर थी। दिल्ली की ऊँचाइयों से उतरती तेज़ गर्मी घर की दीवारों तक पहुँच चुकी थी। स्कूलों की गर्मी की छुट्टियाँ होने लगी थीं और हर वर्ष की तरह इस बार भी वेद के मन में था की वीआर मॉल में एवेंजर्स की नई मूवी देखी जाएगी, फिर सबवे का मैक्सिकन सैंडविच खाया जाएगा, वाटर पार्क घुमा जाएगा।

पर पापा ने अचानक घोषणा की —
“इस बार छुट्टियों में गाँव चलेंगे।”

वेद चौंका।
“गाँव? क्यों?”

“बहुत दिन हो गए तेरे चाचा-चाची से मिले हुए। घर तो अपना ही है, पर समय के साथ दूरियाँ बढ़ गई हैं। अब समय है उन्हें मिटाने का।”

वेद ने पहले थोड़ी ना-नुकुर की, लेकिन माँ ने कहा, “चल बेटा वैसे भी, मिट्टी की ख़ुशबू मोबाइल में नहीं आती।”

वेद ने कोई प्रतिवाद नहीं किया, पर भीतर एक अनजाना संकोच जरूर था। गाँव से उसका नाता बहुत धुँधला था—बचपन में गया था, पर यादें अब चित्रों की तरह धुंधली थीं।

जब वे गाँव पहुँचे, तो पक्के रास्ते धीरे-धीरे कच्ची पगडंडियों में बदलने लगे। आसपास आम के बाग़, दूर-दूर तक फैले खेत, और बीच-बीच में छाँव देती बबूल की डालियाँ—इन सबने जैसे समय की गति धीमी कर दी थी।

गाँव का घर जब दिखा, तो वेद ने खिड़की से झाँका। बहुत बड़ा, कई कमरों वाला, बरामदे और आँगन से सजा हुआ वो घर उसके लिए किसी चित्रकथा की तरह था।

चाचा-चाची बाहर ही खड़े थे।

चाची ने मुस्कराते हुए कहा,
“अरे आ गए तुम लोग? देखो तो, बेटा कितना बड़ा हो गया!”

चाचा ने वेद के सिर पर हाथ फेरा,
“पहचाना बेटा? तू यहीं तो पैदा हुआ था… माँ-बाबूजी की गोद में तू घंटों खेला करता था।”

वेद चुपचाप मुस्कुरा दिया। अपने ही घर में आकर भी वह कुछ अजनबी-सा महसूस कर रहा था—शायद समय की दूरियों की दीवारें इतनी जल्दी नहीं गिरतीं।

गाँव की दोपहरें शांत होती हैं—पंखे के नीचे सब सो जाते हैं और समय जैसे ठहर जाता है।

ऐसी ही एक दोपहर, जब वेद घर में अकेले भटक रहा था, उसकी नज़र आँगन के बाएँ कोने में बने एक छोटे से कमरे पर पड़ी, जिसे सब पूजा वाला कमरा कहते थे। दरवाज़ा थोड़ा खुला था—जैसे बुला रहा हो।

वेद अन्दर आया, दरवाज़ा चरमराता हुआ खुला। भीतर धूप की हल्की रेखा टेढ़ी होकर गिरी थी। कमरे में एक कोने में पुरानी कपड़े की गठरी बंधी थी—चूहे उसके एक किनारे को कुतर चुके थे। वेद ने हल्के से उसे खोला।

भीतर थे श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भगवद्गीता, ब्रज विलास, राधेश्याम रामायण, और न जाने कौन-कौन से ग्रंथ। कुछ पन्ने पीले पड़ चुके थे, कुछ के किनारे मुड़े हुए, पर अक्षर अब भी जीवित थे। पास ही एक गोल पत्थर का चंदन घिसने का पाटा और उस पर रखी चंदन की लकड़ी, जैसे किसी ने आख़िरी बार चंदन घिसा हो और फिर यूँ ही छोड़ दिया हो।

वेद अवाक खड़ा था—मानो किसी ने उसे बिना बोले कुछ सौंप दिया हो।

शाम को वेद ने माँ से पूछा,
“माँ, ये कमरे में जो गठरी थी, वो किताबें किसकी हैं?”

माँ ने कहा,
“तेरी परदादी की थीं बेटा- अजिया की। पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर जितनी संस्कृत उन्हें आती थी, उतनी तो हम लोग डिक्शनरी से भी न सीख पाएं।”

“वो रोज़ चंदन घिसती थीं क्या?”

“हाँ, घंटों। सुबह जल्दी उठती थीं। स्नान करके, पीले वस्त्र पहनकर, बैठ जाती थीं चंदन घिसने। फिर तुलसी को जल देतीं, और रामचरितमानस पढ़तीं।”

“पर अब तो कोई नहीं पढ़ता न?”

“अब किसके पास इतना समय है? अब तो बाज़ार से डिब्बी वाला चंदन आता है, और किताबें मोबाइल में पढ़ी जाती हैं।”

वेद चुप रहा। पर उस चुप्पी में प्रश्न भी थे और श्रद्धा भी।

रात को माँ ने दबी आवाज़ में एक और बात बताई।

“अजिया जब बहुत बीमार थीं, तो उन्होंने अपने छोटे बेटे- तेरे छोटे बाबा से कहा था—’मेरे जाने के बाद मेरी गया ज़रूर कर देना। मैं जानती हूँ तुम लोग खुद के पैसे से नहीं करोगे, इसलिए कुछ पैसे रख दिए हैं—उनसे ही कर देना।’

“पर जैसे ही छोटे बाबा को पैसे का पता चला, उन्होंने वही पैसे अजिया की इच्छा के बिना निकाल लिए। और फिर… अजिया चली गईं। उनकी गया नहीं हुई।”

ये सुनकर वेद को भीतर से जैसे कुछ चुभ गया।
“जिन्होंने पूरी उम्र भक्ति में लगाई, जिनकी सुबहें चंदन की सुगंध में डूबी होती थीं… उनकी अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं हुई?”

अगले दिन सुबह वेद पूजा वाले कमरे में गया। गठरी फिर से बाँधी, पर इस बार संभालकर। किताबें, चंदन, पाटा—सब एक झोले में रखा।

चाची ने देखा तो पूछा,
“अरे बेटा, ये सब ले जा रहा है?”

वेद बोला,
“हाँ चाची, मैं इन्हें अपने पास रखना चाहता हूँ।”

“अरे अब कौन पढ़ता है ये सब?”

“क्या करेगा इनका?” चाची हँसीं।

“वो सब करूँगा जो अजिया करती थीं,” वेद बोला। “जिन्हें सबने पुराना और बेकार समझा, शायद वहीं सबसे मूल्यवान हो।”

शहर लौटकर वेद ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ एक नया नियम बनाया।
हर सुबह सबसे पहले वह वही चंदन का पाटा निकालता, चंदन घिसता, और ठाकुर जी को अर्पित करता। फिर उसी पुरानी गठरी से श्रीरामचरितमानस निकालकर पाठ करता।

धीरे-धीरे उस घर की सुबहों में फिर से सुगंध लौट आई—चंदन की, श्रद्धा की, और स्मृति की।

वेद अब भी स्कूल जाता, खेलता, हँसता, पर भीतर कुछ बदल चुका था।
वह जान गया था—विरासत सिर्फ ज़मीन या गहनों की नहीं होती, कभी-कभी वह उन अक्षरों की होती है जिन्हें समय ने भुला दिया हो।

वेद ने अजिया की गया नहीं की,
पर उसने वह कर दिया,
जो गया से भी बड़ा था।

उसने एक परंपरा को फिर से जीवित किया,
एक आत्मिक उत्तराधिकार को संभाला,
और अपने भीतर अजिया की आत्मा को स्थान दिया।

अब वह सिर्फ शहर का छात्र नहीं था—
वह संस्कृति का वाहक,
विरासत का रक्षक,
और उन अक्षरों का पुत्र बन चुका था,
जो धूल से भरे थे, पर दीप जैसा जलते थे।

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