अपना आप सुधार कीजिए
पंच तत्व से बनी देह यह
इसका मत अपमान कीजिए
प्राप्त हुआ क्यों मानव जीवन
इस पर भी तो ध्यान दीजिए
जग का तो सुधार सम्भव है
अपना आप सुधार कीजिए
अंहकार खुद का दुश्मन है
मन से इसे निकाल दीजिए
मानव हो तुम हर मानव से
मधुर मधुर व्यवहार कीजिए
जग का तो सुधार सम्भव है
अपना आप सुधार कीजिए
सृजन करो नित नए गुणों का
जीवन का कल्याण कीजिए
लिखता है कविता ‘उदास’ क्यों
इस पर चिंतन शीघ्र कीजिए
जग का तो सुधार सम्भव है
अपना आप सुधार कीजिए
रमेश चंद्र ‘उदास’