शिक्षा इमारत
खण्डहर तो फिर बयान दे जाते।
सचेत कर जाते जो हमे ईमान से।
आज बने जब चमकीली इमारते।
ढह जाए कब, बने गर बे ईमान से।।
गुरुकुल होते थे कुटिया व आंगन में।
खतरा भी कम था पत्थर सामान से।
शिक्षा होती थी भले ही पेड़ के नीचे।
संस्कार होते वहाँ सत्य व ईमान से ।।
इमारतें भव्यता की, है ऊँची सवारी।
शिक्षा इमारत भी क्या उतनी हमारी।
हो रहे है हादसे, क्या गांव शहर से।
बुलंदीयाँ तो सिर्फ नींव निर्माण से।।
(श्रदांजलि)
(लेखक- डॉ शिव ‘लहरी’)