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27 Jul 2025 · 10 min read

कृष्ण और उनके प्रतीक

:::::::::कृष्ण और उनसे जुड़े प्रतीक:::::

कृष्ण ,कदंब ,यमुना और सखा
मैं समय हूँ जो दिखता नहीं । जैसे हवाओं को महसूस किया जाता है,नदी की लहरों को देखा जा सकता है ,पक्षियों की उड़ान को समझा जा सकता है ठीक वैसे ही मुझे गुजरते महसूस किया जा सकता है ,मेरे पीछे छूटे निशानों को देखा जा सकता है और फिर मेरी उड़ान को भी समझा जा सकता है।
मेरे सीने में कितने युग दफन हैं,कितनी क्रांतियाँ कितने इतिहास छिपे हैं। और इसी इतिहास के झरोखे में झांक कर देखता हूँ तो वही मधुरिम वंशी की धुन ,कदंब का वृक्ष, गोवर्धन,यमुना का तट ,सखाओं के साथ गाय चराते और गोपियों के साथ रास रचाते कृष्ण दिखते हैं।
वृंदावन में अतीत के झरोखों से सुनाई पड़ती बांसुरी की मधुर धुन में खो कर समय चक्र को घुमा अतीत के दर्पण में कदंब से मुलाकात
समय :–मैं समय हूँ ।तुम द्वापर युग बहुत प्रसिद्ध हुये थे कदंब ।पर आज तुम्हें कोई याद नहीं करता। सुना है तुम्हारे गुणों को पुनः खोज़ कर संरक्षित करना शुरु किया गया है।
कृष्ण के साथ तुम्हारा अभिन्न संबंध रहा। उनकी लीलाओं के तुम साक्षी रहे होकृष्ण से अपने संबंध को स्पष्ट करो।
कदंब–समय के गर्त में सब छिपा है आपसे क्या छुपा है । नवीन दृष्टि से जानना है तो सुनो वह कहानी जो लाखों जन के मन को सदैव लुभाती रही।
भगवान कृष्ण का चरित्र उनकी नटखट बाल लीलाओं के बिना अधूरा है। जिसमें उनके सखाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा ।

श्रीमद् भागवत्, भक्तमाल आदि ग्रन्थों में भगवान श्रीकृष्ण के बाल सखाओं का उल्लेख मिलता है जो ब्रज में उनकी बाल लीलाओं में सहयोगी थे।
यह सब गोलोक धाम में श्री हरि विष्णु के साथ के अन्य देव थे जो द्वापर में कृष्ण अवतार में उनके सहयोगी बन कर उनके सखा रूप में अवतरित हुये थे।

अब सुनिए मेरी बात यानि कदंब की। तियोयपण्णति के सर्ग तीन सूत्र 136व सर्ग6और सूत्र 28 के अनुसार –चैत्यवृक्षों के भेद निर्देश –असुरकुमारादि दस प्रकार के भवनवासी देवों के भवनों में जो दश प्रकार के चैत्यवृक्ष हैं उनमें छठवें भवन में कदंब वृक्ष है और किन्नर,किंपुरुष आदि आठ प्रकार के व्यंतर देवों के भवन में आठवें देव के भवन में कदंब वृक्ष विद्यमान है।
इसका अर्थ है कि प्राचीन काल से लेकर द्वापर तक कदंब वृक्षों का अस्तित्व बहुलता से था। यह भी अशोक ,पीपल,चंपक,नागद्रुम ,तुलसी,प्रियंगु शिरीष की तरह पूजा जाता था।
कदम्ब का अधुनातम वानस्पतिक नाम रूबियेसी कदम्बा है पुराना नाम नॉक्लिया कदम्बा।यह कोलकाता,पश्चिम बंगाल,भारतमें मुख्य रूप से अंडमान,और आसाम में पाया जाता है।यह तेजी से बढ़ने वाला वृक्ष है।
ब्रजके वनवैभव में भी कदंब मुख्य था जो नैसर्गिक सौंदर्यवृद्धि करने के साथ ही अपने विविध उपयोगों द्वारा भौतिक समृद्धि में भी सहायक था।इनके साथ बटवृक्षों की सघनता भी उल्लेखनीय है ।भाण्डीरवन में इन बटवृक्षों की बहुतायत का कारण यह रहा क्यों कि भाण्डीरवन कृष्ण की लीलाओं का केंद्र था। जहाँ जहाँ कृष्ण ने लीलाएँ की वहाँ वहाँ यह वृक्ष लगाये गये और उनके नाम विशेषताओं के आधार पर रखे गये यथा अक्षय वट,वंशी वट,विशाल वट,श्याम वट।तमाल के वृक्ष भी कृष्ण लीला के साक्षी रहे।भक्त कवियों ने भी श्याम के साँवले रंग की तुलना श्याम तमाल व श्याम वट से करते हुये नामकरण किया।
साँस्कृतिक महत्व से जिन वृक्षों का चित्रण प्राचीन कलावशेषों में मिलता है उनमें कदंब के साथ अशोक,चंपा,पीफल ,नागकेशर आदि भी हैं।
कदंब ब्रज का सर्वाधिक प्रसिद्ध फूलदार वृक्ष है ।वर्षा ऋतु में फूलने पर यह पूरा वृक्ष हल्के पीले रंग के छोटे-2फूलों से भर जाता है।इसकी मादक सुगंध से ब्रज महकने लगता था।इसकी उपजातियाँ भी तब बहुलता से पाई जाती थी जिनमें श्वेत-पीत,लाल,और द्रोण कदंब विशेष उल्लेखनीय है।
कुमुदवन की कदंबखंडी में लाल रंग के फूल वाले कदंब भी पाये जाते हैं।श्याम ढाक आदि कुछ स्थानों में ऐसी जाति के कदंब भी हैं जिनके पत्ते प्राकृतिक रूप से मुड़े हुये निकलते हैं। इन्हें द्रोण कदंब कहा जाता है।
कृष्ण ने वृंदावन निर्माण के समय इन्ही पत्तों के दोने में राधा को खीर खिलाई थी।
राधा कृष्ण की लीलाओं ,महारास के साथ प्रणय संबंधों का भी यह साक्षी रहा है।
मध्यकाल में ब्रज के लीलास्थलों के अनेख उपवनों में इसे बड़ी संख्या में लगाया गया था ।उन बनों को कदंबखंडी कहा जाता था।
अनेक औषधीय गुणों के कारण यह कदंब पर्यावरण हितैषी भी है।
कालियादह नाग से युद्ध के पश्चात् श्री कृष्ण ने कदंब के पेड़ पर जाकर ही विश्राम किया था।उसका कारण यह था कि सर्प विष को पूरी तरह मारने में कदंब सक्षम था। बन संपदा अधिक होने के कारण विषैले सर्प आदि जानवर बहुतायत में थे। और उस समय लोग कदंब के इस गुण से परिचित थे ।इस लिए कदंब श्रेष्ठी जनों के आँगन में भी लगा होता था। कृष्ण की शरारतों से तंग गोपियों के उलाहने सुन कर यशोदा सदैव उन्हें आँगन में लगे कदंब से ही बाँधा करती थी।
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार भी कदंब के कृष्ण प्रिय होने का यही वैज्ञानिक कारण था।महाभारत काल में भी कदंब का महत्व था।उस समय भीयह पेड़ प्रत्येक घर के बाहर ,आँगन में लगा होने का कारण साँपों से लोगों का दुखी होना था।इसकी पत्ती,छाल और फल भी कई बीमारियों में लाभदायक हैं।इसका फल शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ हृदय विषाद में भी काम करता है ।इसकी पत्तियाँ व फल ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने एवं एंटीबैक्टीरियल भी है । ।पथरी में भी एक फल खाने से लाभ मिलता है।रतौंधी की बीमारी दूर करने ,हाजमा सही करने व मुँह के अल्सर में पेड़ की छाल का काढ़ा पीना भी लाभदायक माना जाता है।वायुमंडल में आक्सीजन के रूप में जीवन देने में भी कदंब बहुत महत्वपूर्ण है।क्यों कि यह अपेक्षाकृत ज्यादा मात्रा में आक्सीजन प्रदान करता है। तथा हवा में तैरते विषाक्त सूक्ष्मकणों एवं भारी तत्वों को भी अवशोषित कर वातावरण शुद्ध करते हैं।
आज भी मौजूद है चीर घाट का वह कदंब का पेड़ जो द्वापर में भी था ।लोक कथाओं में कन्हैया गोपियों के कपड़े चुरा कर इसी वृक्ष की घनी डालियों में छिपे थे।इसी वृक्ष पर असुर वध के बाद कृष्ण ने विश्राम कर स्वयं को तरोताजा किया था।
इसी वृक्ष के साये में सुदामा के साथ भीगे चने खाये थे कृष्ण ने।
यह स्थान पहले यमुना तट.पर था पर वर्षों बाद यमुना के मार्ग बदलने के कारण यह घाट कुछ दूरी पर हो गया है।यही प्राचीन द्वापर युगीन कदंब वृक्ष है जिसे वृंदावन में आज भी भक्त लोग पूजते हैं।

उनके सखाओं की बात करें तो विभिन्न अवतारों के समय अनेक लोग उनके भक्त बन उनके रूप से मोहित हो उन्हें आराध्य रूप से पूजने और प्राप्त करने की कामना कर तप आदि करने लगे थे ।तब कृष्ण ने उन्हें द्वापर में जन्म लेने और उनका मनोरथ पूरा करने का वचन दिया था। वही सभी लोग गोप-गोपियाँ के रूप में जन्म लेकर रास लीलाओं में साथी बने थे। और प्रेम मुग्ध होकर अभिप्राय पूर्ण किया था।
उनके प्रिय मित्रों में मधुमंगल, श्रीदामा व सुदामा से भगवान श्रीकृष्ण का अनन्य प्रेम व लगाव सबसे ज्यादा था।

कृष्ण -राधा
कृष्ण –संपूर्णता का प्रतीक समझे जाने वाले स्वयं में ही स्वयंभू हैं। एक समय नाम जातक के गुणों के आधार पर रखा जाता था।
जानते है कृष्ण नाम की सार्थकता ।
कृष्ण जब ब्रज पहुँच जाते हैं तब शुभ मुहूर्त में ऋषि गर्ग के पदार्पण पर उन्होंने कृष्ण के गुण बताते हुये नामकरण किया ..
‘क‘का अर्थ है कमलाकांत ,*ऋकार* का अर्थ है राम‘, अक्षर षडविध ऐश्वर्य के स्वामी भगवान विष्णु का वाचक है । नरसिंह का प्रतीक और अकार ‘अक्षर अग्निभुक् अर्थात् अग्निरूप से हविष्य के भोक्ता अथवा अग्निदेव के रक्षक का वाचक है।तथा दोनो विसर्ग बिंदू (:)नर-नारायण के बोधक हैं। ये छहों पूर्णतत्व जिस महामंत्र रूप परिपूर्णतम शब्दों में लीन है वह इसी व्युत्पत्ति के कारण कृष्णः कहा गया।
श्रीहरि वल्लभा लक्ष्मी भी हर अवतार में उनके साथ रही हैं अतः आवश्यक है कि कृष्ण के संदर्भ में राधा नाम की सार्थकता को समझा जाये। कार से रमा का कार से गोपियों का, कार से धरा का तथा पुनः कार से विरजा नदी का ग्रहण किया जाता है। लीला,भू,श्री और विरजा ये चार पत्नियाँ श्री कृष्ण के सर्वोत्कृष्ट तेज के चार रूप हैं जो कुञ्जवन में जाकर राधा के विग्रह में समा गये थे।इसीलिए राधा परिपूर्णतमा कहलाई ।
अब जानते हैं पृथ्वी पर यमुना ,गोवर्धन और मथुरा की चोरासी कोस भूमि का सच। तथा कृष्ण के सखा भाव का महत्व
चौरासी कोस की पैदल यात्रा का आज भी बहुत महत्व है और विशेष तिथि में व्रत के साथ उसकी परिक्रमा की जाती है जिसका फल गोलोकधाम की प्राप्ति कहा जाता है।
गर्ग संहिता के अनुसार पृथ्वी पर छाये संकट के निवार्णार्थ सभी देव श्री हरि के पास दर्शन करने गये और समस्या बताई तब श्री हरि ने ब्रह्मा के कहने पर स्वयंभू कृष्ण के धाम यानि गोलोक जाने को कहा। ब्रह्मा जी द्वारा उस लोक के दर्शन की चाहत के मद्देनजर विष्णु जी ने ब्रह्मांड के लोक शिखर पर विराजमान गोलोक धाम का मार्ग प्रशस्त किया जहाँ उज्जवल श्वेतरेशमी वस्त्र समान विरजा प्रवाहमान थी तथा शेषनाग की गोद में आलोकमय गोलोकधाम। एक अलग ही ब्रह्मांड में यमुना स्वछंद प्रवाहित हो रहीं थीं ।उसी गोलोक धाम में कृष्ण, राधा के साथ कौस्तुभमणि के सिंहासन पर विराजमान थे। आठ दिव्य सखियाँ तथा श्रीदामा ,प्रभृति आदि आठ गोपाल उनकी सेवा में तत्पर । देवों के कौतुहल को देख कृष्ण ने अपने विराट रुप का दर्शन कराते हुये विभिन्न अवतारों को अपने विग्रह में समाते हुये दिखाया।तब देवों को यकीन हुआ कि पुनः भगवान का अवतार लेना क्यों आवश्यक है कृष्ण ने भवितव्य बताते हुये राधा ,श्रीदामा आदि को ब्रज में जन्म लेने को कहा ।राधा ने यमुना ,गोवर्धन और वृन्दा (तुलसी) वन के बिना जाने से इंकार कर दिया। यह गोलोक की शोभा के साथ अटूट अंग और संपत्ति थे। कृष्ण ने समाधान करते हुये चौरासी कोस भूमि,यमुना और गोवर्धन को ब्रज भूमि में भेजा।लक्ष्मी,पार्वती,दक्षिणा,विरजा,लज्जा व गंगा आदि को क्रमशः रुक्मणि,जाम्बती,लक्ष्मणा,कालिंदी,भद्रा और मित्रविन्दा रूप में अवतरित होने को कहा तथा सुबल,श्रीदामा,स्तोककृष्ण ,अर्जुन एवं अंशु को नौ नंदों के पुत्र रूप में अवतरित होने का निर्णय दिया।ब्रजमंडल के छ वृषभानुओं के यहाँ विशाल,ऋषभ,तेजस्वी,देवप्रस्थ और वरूथप को सखा रुप में उत्पन्न हो आगे की लीलाओं हेतु सखा रूप में रहने को कहा। यह सभी गोपाल रूप में कृष्ण के अनन्य भक्त व सखा उनकी लीलाओं के सहभागी व ब्रज हित कार्यों में सहयोगी थे। इसी लिए कृष्ण का इनके प्रति अति प्रगाढ़ मित्र या सखा भाव था। यह कृष्ण के अनन्य भक्त थे और अंतिम समय कृष्ण की कृपा चाहते थे। और उन सभी की मुक्ति हेतु द्वापर युग का समय तय किया गया था।
प्रसंगवश यहाँ नंद,उपनंद,नंदराज, वृषभानु,और गोपाल का अंतर समझना समीचीन होगा।
गोपाल –गौओं का पालन व गौ सेवा ही जिनकी जीविका है।
नंद –गोपालों के साथ नौ लाख गायों के स्वामी को नंद पदवी
उपनंद –पाँच लाख गायों के स्वामी
वृषभानु –दस लाख गायों के स्वामी
नंदराज जिनके यहाँ एक करोड़ गायें हों वह नंदराज कहलाते हैं।
वृषभानुवर के अधिकार में पचासलाख गोयें रहती थीं।
द्वापर ,त्रेता आदि युगों में पशुधन संपत्ति माना जाता था। और गायों का महत्व बहुत था। अतः राधा नंदराज वृषभान जी की पुत्री के रूप में अवतरित हुई कलिन्दाजाकूलवर्ती निकुंज प्रदेश के सुंदर मंदिर में । कालिंदी अर्थात् यमुना
पूर्व समय के अवतारों की पत्नियाँ रमा के अंशरुप सोलह हजार की संख्या में महारास के समय प्रगट हुईं थीं।
जब यमुना श्रीकृष्ण की परिक्रमा कर भू तल पर जाने को उद्दत हुईं उसी समय विरजा तथा ब्रह्मदेव से उत्पन्न गंगा ,दोनों ही विरजा में विलीन हो गयीं। इसी लिये परिपूर्णतमा कृष्णा (यमुना) श्री कृष्ण की पत्नी भी मानी जाती हैं। फिर कालिंदी अपने तीव्र वेग से विरजा की गति को बाधित करते हुये निकुंजद्वार से बाहर निकली और असंख्यात ब्रह्माण्ड समूहों को स्पर्शित करते हुये उसकी दीर्घजलराशि अपने महान वेग से श्री वामन के बायें चरण के अंगूठे के.नख से विदीर्ण हुयेब्रह्मांड के शिरोभाग में विद्यमान ब्रह्मद्रवयुक्त विवर में गंगा के साथ प्रविष्टि हुई। वहाँ से यमुना ध्रुवमंडल में स्थित भगवान विष्णु के धाम वैकुंठलोक से होती हुई ब्रह्मलोक को लांघ जब नीचे गिरी तब सुमेरु पर्वत के शिखर पर तीव्रता से गिरते हुये अनेक शैलभृंगो को लांघते बड़ी बड़ी चट्टानों के तटों को तोड़ती मेरू पर्वत से दक्षिण की ओर बढ़ीं तब यमुना -गंगा अलग हो गयींऔर कृष्णा (यमुना)कलिंदशिखर पर जा पहुँची उस पर्वत से प्रकट होने के कारण उनका अपर नाम कालिंदी हुआ। गिरि के शिखरों की चट्टानों को अपने वेग के आघातों से तोड़ते भूखंड पर वेगवती कृष्णाकालिंदी अनेक देशों को पवित्र करती खाण्डववन (इंद्रप्रस्थ–दिल्ली के पास) पहुँची। चूंकि यमुना ,कृष्ण को परिपूर्णता से पाना चाहती थीं.अतः वह दिव्य देह धारण कर खाण्डववन में रुक गयीं और तप शुरु किया। यमुना के पिता सूर्य ने जल के भीतर दिव्य गेह निर्मित किया। कहते हैं दिव्य यमुना आज भी वहीं रहती हैं।
खाण्डववन से वेगपूर्वक प्रवाहित होते हुये कालिंदी ब्रजमण्डल में वृंदावन और मथुरा के निकट पहुँची। राधा कृष्ण की लीलाओं,विवाह ,प्रेम प्रसंगों की साक्षी बनी ।महावन के पास सिकतामय (रेतीली)रमणस्थली से होते हुये गोकुल में विशाखा के रूप में अपने नेतृत्व में गोप किशोरियों का यूथ (समूह) बनाया और श्री राधा की प्रिय सखी बन कृष्ण का सामीप्य प्राप्त किया।कृष्ण महारास में शामिल होने हेतु वहाँ निवास बनाया। यहाँ विशाखा रूप में कृष्ण की पत्नी रुप थी वह।पश्चात् ब्रज से आगे जाने लगी तो वियोग व्याकुल अश्रु बहाते हुये पश्चिम की ओर बढ़ते हुये अपने वारिवेग से तीन बार प्रणाम कर यमुना प्रयाग पहुँची जहाँ गंगा से पुनः संगम हुआ और उनके साथ क्षीर सागर तक पहुँच वहाँ से वापस गोलोक धाम पहुँची।
ब्रज के वृंदावन में जब वह रुकी तो वहाँ विरजा रूप में कृष्ण के साथ एकांत कुंज में रमण करते वक्त राधा को पता चला ।सौतिया डाह से भरी राधा तुरंत कुंज पहुँची।जहाँ श्रीदामा आदि सखा कुंजद्वार पर पहरा दे रहे थे।उन्हें प्रताड़ित कर वह.कुंज में प्रविष्ट हुईं। पर वहाँ कोई न दिखा।कारण कि जैसे ही कुंज द्वार पर राधा व उनकी सखियों का कोलाहल सुना तो श्री हरि अंतर्ध्यान हो गये व भयाकुल विरजा सहसा नदी रूप में परिणित हो कोटि योजन विस्तृत गोलोक (वृंदावन) में चारों और प्रवाहित होने लगीं। यह वही गोलोक वृंदावन ब्रज में है जिसके चारों और विरजा यमुना रूप में ऐसे प्रवाहित होती हैं मानों उन्होंने उसे अपनी बाँहों में सँभाल कर हृदय के निकट रखा हो।

यह था कृष्ण का यमुना ( अपर नाम विरजा ,कलिंदी ,कृष्णा ) के प्रति लगाव व खास सखाओं और गोपियों के प्रति सखा भाव ,अद्वेत भाव ।जिस के कारण भगवान ने अपने भक्तों से खुश हो द्वापर में उनके मनोनुकूल साथ ,स्नेह देकर ,यश,नाम देकर मुक्ति प्रदान की व नाम अमरत्व का वरदान दिया।वर्ना आज कौन यमुना ,कदंब व सखाओं को जानता? ना ही सूरदास कृष्ण काव्य लिख पाते न सुभद्रा जी लिखती यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे और न नागार्जुन व अन्य कृष्ण शाखा के कवि यमुना कालिंदी कदंब.का उल्लेख करते।
जय श्री राधेकृष्ण।
मनोरमा जैन पाखी
मेहगाँव जिला भिण्ड
मध्यप्रदेश

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