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27 Jul 2025 · 1 min read

सिर खाता हूँ

जब भी लोगों से मिलता हूँ, घर आता हूँ
सबसे ज़्यादा अपने-आप से घबराता हूँ

हकलाते-हकलाते जब खुलने लगता हूँ
जाने किसको जाने क्या-क्या कह आता हूँ

बंदर, मोहरे, बुत, स्टैच्यू… बनाने वाला
बोला मुझसे चलो तुम्हे भी समझाता हूँ

चक्कर को चिंतन कहकर वो ख़ुश हो लेंगे
एक जगह बैठे-बैठे मैं थक जाता हूँ

मेरी खिड़की में क्योंकर वो सिर देते हैं
जिन्हें शिकायत है मैं उनका सिर खाता हूँ

-संजय ग्रोवर

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