डमरू घनाक्षरी
नटवर
नटखट नटवर, मटक-मटक कर,
तट पर चलकर, तकत हरष जग।
लटक-लटककर, उछल-उछलकर,
झटक-झटक रज, ठहर-ठहर पग।
पवन मचलकर, लट पर फरफर,
उलझ उलझकर, सरर-सरर भग।
लहर-लहर चल, इत-उत जलभर,
चहक चहक तब, सब वनचर खग।।
-गोदाम्बरीनेगी ‘पुण्डरीक’
नटवर
नटखट नटवर, मटक-मटक कर,
तट पर चलकर, तकत हरष जग।
लटक-लटककर, उछल-उछलकर,
झटक-झटक रज, ठहर-ठहर पग।
पवन मचलकर, लट पर फरफर,
उलझ उलझकर, सरर-सरर भग।
लहर-लहर चल, इत-उत जलभर,
चहक चहक तब, सब वनचर खग।।
-गोदाम्बरीनेगी ‘पुण्डरीक’