ओम् सृष्टि आधार है, यही जगत आमाप।
ओम् सृष्टि आधार है, यही जगत आमाप।
निर्विकार जिससे बनें, मिटे सकल संताप।।
ओमकार हैं जगत पिता, शरण गहें धर ध्यान।
सकल भोग वैभव मिले, संग जगत पहचान।।
शिव शंकर संतुलन में, रखते रूप अनूप।
धीरज रखना सीख ले, मिले छाँव या धूप।।
बीज मंत्र इस ओम् का, करके मन से जाप।
“पाठक” शिव के शरण में, डाल दिया संताप।।
:- राम किशोर पाठक (शिक्षक/कवि)