कारगिल
दन दना दन दन निरंतर चल रही थी गोलियां
दड दड़ा दड़ दड़ निरंतर बढ़ रही थी टोलियां
शत्रु था इस बहम में वह जीत लेगा चोटियां
शिखर हिमालय का खड़ा कह रहा था बोलियां
तन पे तिरंगा लगा चढ़ रहे थे सपूत भारत भूमि के
मृत्यु भी जिनसे डरे महाकाल के ही रूप थे
जय भवानी हर हर महादेव सुर गूंजते थे राह में
ऊपर था शत्रु फिर भी साहस खुद चल रहा पांव में
पाई विजय अजेय सेना जय हो भारत मात की
त्याग से ही रंगी धरा यह कारगिल की बात थी