कारगिल युद्ध
!!! कविता!!!
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शौर्य और बलिदान को नमन।
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वो जंग थी पर्वतों की छांव में,
जहाँ वीर सजे थे तिरंगे के भाव में।
कारगिल की धरती पुकार रही थी,
हर सिपाही की रगों में आग भर रही थी।
हिम की चादर में दुश्मन छिपा बैठा था,
पर हिंदुस्तान का फौजी कब डरता था।
एक-एक चोटी पर झंडा लहराया,
अपने लहू से हमने इतिहास बनाया।
बर्फ़ में जमे थे जिस्म कई रातों से,
पर जोश जिंदा था मातृभूमि की बातों से।
कैप्टन विक्रम की गूंज थी “ये दिल मांगे मोर”,
हर गोली में था भारत माँ का शोर।
लेफ्टिनेंट सौरभ की हिम्मत भी कम न थी,
शहादत की राह पे वो भी थमा न थी।
हर वीर ने हँसकर जान गँवाई,
तभी तो ये आज़ादी हमने पाई।
नमन है उन रणबांकुरों को सदा,
जिनकी वजह से सर उठता है खुदा।
कारगिल सिर्फ़ एक युद्ध नहीं कहानी है,
ये भारत माँ की अमर जवानी है।
🇮🇳 जय हिंद! वंदे मातरम्! 🇮🇳
डॉ मनोरमा चौहान
(मध्य प्रदेश हरदा)