मुक्तक
लिखते रहते रात दिन, हम साँसों के गीत ।
हर उपमा, उपमान है, छल-छल कागज प्रीत
जग की कहूं विभीषिका, सुनी न मन की बात
जो सहा वो लिखा नहीं, गाते रहे अतीत ।।
सूर्यकांत 🙏
लिखते रहते रात दिन, हम साँसों के गीत ।
हर उपमा, उपमान है, छल-छल कागज प्रीत
जग की कहूं विभीषिका, सुनी न मन की बात
जो सहा वो लिखा नहीं, गाते रहे अतीत ।।
सूर्यकांत 🙏