तिरछी निगाहों से वो,
तिरछी निगाहों से वो, घात करें बार बार,
नाजुक हृदय मेरा, घायल हो जाता है|
काली- काली लटें जब, उंगली से सुलझाये,
श्याम वर्ण मेघ जैसे, मन में समाता है |
चंद्रमुखी सा स्वरूप, कोकिला सा कंठ ले के,
मंद मंद मुसकाये, बहुत ही भाता है|
“प्रेम” ये लगाव देख भान हो रहा है जैसे,
मात्र आज का नहीं ये, जनमों का नाता है |
डॉ प्रवीण कुमार श्रीवास्तव प्रेम