#लघुव्यंग्य
#लघुव्यंग्य
#कागज़ के #घोड़े, कागज़ पे #दौड़े।
#उगना से #पिपलोदी तक एक ही #हाल : केवल #मिसाल।
(प्रणय प्रभात)
“सीएम ने सीएस को बोला,
सीएस ने पीएस पर ढोला,
पीएस ने यूएस पर डाला,
यूएस ने कलेक्टर पर टाला,
कलेक्टर ने मातहतों को सौंपा,
मातहतों ने अमले पर थोपा,
अमले ने गमले में बोया,
बीज मिट्टी के नीचे सोया,
न पौधा बना न बेल।
ख़त्म हो गया खेल।।
उसके बाद क्या…? वही…हादसे, आपदा और त्रासदी।
चीख, चक्लास के चोंचले,
आशियाने के बदले मुआवजे के घोंसले।
घड़ियाली आंसू
और फ़िल्म बन गई धांसू।।”
#निष्कर्ष
#झालावाड़_झांकी_है।
#आगे_पिक्चर_बाक़ी_है।।
दूसरे ढंग से कहें तो…
“वो पाएंगे जो कुछ यहां बोते रहेंगे लोग।
अपने गुनाह अश्क़ से धोते रहेंगे लोग।।
तकिए में मुंह के साथ दबाकर के कान को।
लगती रहेगी बांग भी सोते रहेंगे लोग।।
पाने की आस कर के अंधेरों से उजाले।
आंखों की अपनी रोशनी खोते रहेंगे लोग।
दो चार दिन नहीं ये हमेशाँ का खेल है।
होते रहेंगे हादसे, रोते रहेंगे लोग।।”
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संपादक
न्यूज़&व्यूज
(मध्यप्रदेश)