सावन के झूले
डॉ अरुण कुमार शास्त्री , एक अबोध बालक , अरुण अतृप्त – पूर्व निदेशक – आयुष – दिल्ली
विषय -सावन के झूले
शीर्षक -सावन के झूले
तीज़ त्योहार पर मेघ मल्हार पर , सावन के झूले
साजन संग सजनी है झूले।
मन तो मेरा भी करता है , संग – संग में लेकिन डरता है,
सजनी न सहेली, कैसे हम झूलें।
गया उस स्थान पर , झूल रही थीं गोरियां , गाँव की ,
डरते – डरते करी मनुहार जब , सारी की सारी , मुझ पे हँस रही थी।
उलटे पैर भाग लिया , इज्जत का भर्ता हुआ।
लाज से डूबा हुआ , सोच रहा करूँ क्या ?
मन तो मेरा भी करता है , संग – संग में लेकिन डरता है,
सजनी न सहेली, कैसे हम झूलें।
काहे को सावन आये , मन तो सबका ललचाये।
आग लगे जो तन मन में उसको तो बुझा न पाये।
हर तरफ बहार है वर्षा की फुहार है।
मन मेरा डोल रहा , भीतर से बोल रहा , धुक – धुक ये कह रहा।
कोई तो होगा , चल चलें , ये जगत है बहुत बड़ा , मन को समझा रे।
बात उसकी जो मानू , चिन्ता को अपनी त्यागू , खोज में निकल रे।
तीज़ त्योहार पर मेघ मल्हार पर , सावन के झूले
साजन संग सजनी है झूले।
मन तो मेरा भी करता है , संग – संग में लेकिन डरता है,
सजनी न सहेली, कैसे हम झूलें।
लाज से डूबा हुआ , सोच रहा करूँ क्या ?
मन तो मेरा भी करता है , संग – संग में लेकिन डरता है,
सजनी न सहेली, कैसे हम झूलें।
कानों में मधुर – मधुर , एक आवाज़ पड़ी , भ्रम से मेरी हृदय गति ,
यक -ब -यक जोर से बोल पड़ी।
आई वो आई , मिलन घड़ी आई , ईश्वर ने भेजी , सजनी , टेर लगाई।
काहे को सावन आये , मन तो सबका ललचाये।
आग लगे जो तन मन में उसको तो बुझा न पाये।