#मुट्ठी भर चाहत
#मुट्ठी भर चाहत
मुट्ठी भर चाहत लेकर, ख़ुद को आजमाने निकला हूँ।
चाहत का आवरण ओढ़, आसमान उठाने निकला हूँ।
कदम न डिगने पाएँगे, है विश्वास तपस्या पर अपनी।
इसीलिए एक जुगनू बन, अंधकार मिटाने निकला हूँ।
#डा. राम नरेश त्रिपाठी ‘मयूर’