"लटकते जाले"
अब उस घर में खंडहरों का वास है
खिड़कियां दरवाजे बंद,
लटकते जाले ….
सुनाते दास्ता लाचारी और बेबसी की जार जार है
आती आवाज़ डराती बार बार,
उसके अंदर कोई रहता है…
यह अभी भी एक राज है!!
शायद आत्मा मर चुकी है सबकी,
शरीर अभी भी ऊन खंडरों के साथ है
ना हवा पानी ना कोई रंग…
और ना फूलों की खुशबू ही उनके साथ हैं,
आती आवाज़ डराती बार बार,
उस घर में भी कोई रहता है…
यह अभी भी एक राज है!
दम घुटती हुई सांसों से निकलती एक आह,
चरमाराते दरवाज़ों के अंदर….
सिमटी एक दुनिया,जकड़ती एक दूजे का हाथ है,
निरा अंधेरा चारों ओर पुर चुका…
खिलखिलाने की ना कोई आवाज़ हैं,
आती आवाज़ डराती बार बार,
उस घर में भी कोई रहता है…
यह अभी भी एक राज है!!
साकियों से आता जाता उजाला…
चेहरे की थकन मिटाने को बेताब,
बातचीत के नाम पर…
होठों से निकलता शब्द मौन के साथ हैं,
आती आवाज़ डराती बार बार,
उस घर में भी कोई रहता है…
यह अभी भी एक राज है…!!
मधु गुप्ता “अपराजिता”