ये सच है या...
ये सच है या…
मेरे सुख-दुख खँगालता है कोई।
काँटे चुन-चुन निकालता है कोई।
हर घड़ी हर सिम्त नजर मुझ पर रहे,
कि जैसे दूध उबालता है कोई।
आँच मुझ तलक न आने देता कभी,
जब भी बिखरूँ सँभालता है कोई।
दुख के सायों से उबारकर मुझको,
खुशियाँ मुझ तक उछालता है कोई।
हर सच्चाई से वो वाकिफ ‘सीमा’,
ये सच है या मुगालता है कोई।
© सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद