कलियुग की महिमा न्यारी
कलियुग की महिमा न्यारी
कलियुग की है महिमा न्यारी, मनुज जानकर भूलें करता।
पाप पुण्य की चिन्ता तजकर,कोश अर्थ से अपने भरता।
धर्म कर्म करने से पहले,माया का अति गणित लगाए।
लाभ मिले मुझको कब कैसे,दांव पेंच सब उचित बिठाए।
कौन दुखी हो कौन सुखी हो,भाव हृदय से धन हित हटता।
कलियुग की है महिमा न्यारी, मनुज जानकर भूलें करता।
प्रकृति प्रेम की बातें करता, ज्ञान बाँटता अतिशय भारी।
स्वार्थ स्वयं का जब है दिखता,प्रकृति भावना मिटती सारी।
वन उपवन को साफ करे वह, सड़क भवन से यारी रखता।
कलियुग की है महिमा न्यारी, मनुज जानकर भूलें करता।
देख सभ्यता पश्चिम वाली,अपने मन को है भटकाता।
स्वर्ण धातु सी संस्कृति तजकर,गलत पंथ को शीश झुकाता।
आग लगाकर सत रिश्तों पर,जीते जी ही देखो मरता।
कलियुग की है महिमा न्यारी, मनुज जानकर भूलें करता।।
डॉ ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम
शिक्षक व साहित्यकार
भीतरगांव कानपुर नगर