सुकून की तलाश
कदम कदम पर धोखे खाये,
अंगारों सा दहक रहा हूँ।
कभी निहारूँ नील गगन,
कभी बावला सा बहक रहा हूँ।
मदहोश तेरी यादों में खोया,
अपलक चंदा निरख रहा हूँ।
सुकून की तलाश अधूरी है,
मैं सूनी राहों में भटक रहा हूँ।
छोड़ सुरम्य ग्राम गलियाँ,
अनजाने शहर में भटक रहा हूँ।
कौन है अपना कौन पराया,
सबके मन को परख रहा हूँ।
जीवन की आपाधापी में,
एक पल चैन को तरस रहा हूँ।
सुकून की तलाश अधूरी है,
बदराई आँखों से बरस रहा हूँ।
तुम्हे चुरा लूँ तुमसे ही,
एक सपना लेकर चहक रहा हूँ।
सुकून ले गईं गम की रातें,
और मैं तन्हा बहक रहा हूँ।
उजड़ा मधुवन बैठ निहारूं,
थका पथिक सा ठहर रहा हूँ।
सुकून की तलाश अधूरी है,
वो पल पाने को तरस रहा हूँ।
#स्वरचित एवं मौलिक रचना
#डा. राम नरेश त्रिपाठी ‘मयूर’