चाँद-नखत अलकन धरे, मुख पर उजली भोर।
चाँद-नखत अलकन धरे, मुख पर उजली भोर।
कहाँ चलीं नत आनने ? देखो तो इस ओर।।
रूप रुपहला चाँद सा, चमका तम को चीर।
मंद-मंद मुस्कान से, हरता मन की पीर।।
“किंजल्किनी”
चाँद-नखत अलकन धरे, मुख पर उजली भोर।
कहाँ चलीं नत आनने ? देखो तो इस ओर।।
रूप रुपहला चाँद सा, चमका तम को चीर।
मंद-मंद मुस्कान से, हरता मन की पीर।।
“किंजल्किनी”