पवित्र प्रेम
कल रात स्वप्न में….
तुम्हारी प्रेम वासना ने
मेरे प्रेम का आचल,
तार तार कर दिया
तत्पश्चात
मैं उठ गया
थोड़ा शांत,थोड़ा भर्मित सा
बैठा रहा कुछ पल यूँ ही शयन पर अपने
मुझे वासना नहीं,
तुम्हारा प्रेम चाहिए…
क्यूंकि….
गर्माहट तुम्हारे साँसों की
मेरे होठों का कम्पन
तो रोक देगी…
किन्तु मुझे
तुम्हारी मधुर आवाज से निकले,
प्रेम-शब्दों की गर्माहट चाहिए….
अपने मन को तुम्हे समर्पित करना हैं,
तुम्हारी बाँहों के आगोश में नहीं,
बल्कि तुम्हारी प्रेम पाती पढ़कर…..
मुझे क्षणिक प्रेम की लालसा नहीं,
ना ही मेरी हथेलिया,
तुम्हें चादर की सिलवटों में
खोजना चाहती हैं,
बल्कि मुझे प्रेम का
वो एहसास चाहिए….
जो मेरे हृदय के,
कोने में बसकर भी
कस्तूरी की तरह
मेरे जीवन को सदैव महकाता रहे…
जो आखिरी साँस तक
मेरे मन में बसा रहे…
मुझे तुम्हारी वासना नहीं,
तुम्हारा प्रेम चाहिए…