मुखौटे
मुखौटे
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कितने बड़े हैं, कितने घटे हैं —
विवशता के बादल,
जो समय के साथ
कभी घने हुए,
कभी यूँ ही
बिना बरसे छंट गए।
स्वार्थ की आँधी में
बिखरी है व्यवस्था,
और जब आई विपत्ति —
हर चेहरे से नकाब उतर गए।
दिखावे की दुनिया में
अंक बन गया इंसान,
भावनाएँ, संवेदनाएँ
अब नंबरों में तौली जाती हैं।
कौन है जीवित,
कौन है मृत?
अब ये सवाल भी
सांख्यिकी के दस्तावेज़ों में गुम हो जाते हैं।
अपनी अंतरात्मा की आवाज़ —
क्या कभी तुमने
सच में सुनी है?
या हर बार
भीतर की पुकार को
भी
तर्कों और लाभ–हानि के तराज़ू में
तोल दिया है?
हर चेहरा
अब एक मुखौटा है,
जो समय, समाज,
और स्वार्थ के मुताबिक
बदल जाता है।
कभी सोचो —
इन मुखौटों के नीचे
क्या तुम सच में ज़िंदा हो?
डाॅ फ़ौज़िया नसीम शाद