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24 Jul 2025 · 1 min read

#ग़ज़ल

#ग़ज़ल
■ दरबार मत कहिए…!!
【प्रणय प्रभात】

● ख़ुदारा यार मत कहिए।
हवस को प्यार मत कहिए।।

● जो पहली बार बोला है।
वो अगली बार मत कहिए।।

● बुज़ुर्गों का सहारा है।
इसे दीवार मत कहिए।।

● हों पैरोकार गर सच के।
गुलों को ख़ार मत कहिए।।

● सियासत की ज़ुराबें हैं।
इन्हें अख़बार मत कहिए।।

● फ़क़त झूठों की मंडी है।
इसे दरबार मत कहिए।।

● उलझ के जो सुलझ जाए।
उसे तक़रार मत कहिए।।

● बहुत गुमराह हैं राहें।
इन्हें हमवार मत कहिए।।

● कला बेचे, क़लम बेचे।
उसे फ़नकार मत कहिए।।

● तमाशाई हैं सब रिश्ते।
इन्हें ग़मख़्वार मत कहिए।।

● ग़मों की दास्तां है ये।
इसे त्यौहार मत कहिए।।

● जो हो बेताब गिरने को।
उसे दस्तार मत कहिए।।

● हमारी जीत है झुकना।
हमारी हार मत कहिए।।

● हो आदी किरकिरी का जो।
उसे किरदार मत कहिए।।

● छुपा ले मुंह मियानों में।
उसे तलवार मत कहिए।।

● मुसीबत के सताए हैं।
हमें बीमार मत कहिए।।

● रखे ना दार पे सर जो।
उसे सरदार मत कहिए।।

●हमारी आपबीती है।
इन्हें अशआर मत कहिए।।

●संपादक/न्यूज़&व्यूज़●
श्योपुर (मध्यप्रदेश)
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