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24 Jul 2025 · 1 min read

पहले जैसा कुछ भी नहीं।

हम हम न रहें तुम तुम न रहे,पहले जैसा कुछ भी नहीं।
बाग वही बागवां वही है पर पहले जैसा कुछ भी नहीं।

गाँव वही है गलियां वही, चाचा, ताऊ और दाऊ वही।
बचपन के इस गलियारे में, पहले जैसा कुछ भी नहीं।

कांधो पर है बोझ कई, लिए फिरते कई जिम्मेदारी।
आंखो में अब नींद नहीं, पहले जैसा कुछ भी नहीं।

बगीचे से है आस लगाए, गुंजे यहाँ कोई किलकारी।
फूल से हमने ठोकर खाई ,पहले जैसा कुछ भी नहीं।

सागर नदियां झील वही है कुआँ और तालाब वही
प्यास बुझाये हर कोई, पहले जैसा कुछ भी नहीं।

चांद वही, तारे वही, बादल और बरसात वही है।
सबके सब रुठे रहते हैं, पहले जैसा कुछ भी नहीं।

मेरी कलम वही, कविता वही लिखने का है भाव वही
पर कविताओं में रहता अब पहले जैसा कुछ भी नहीं।
•••
✒️ कवि रवि शंकर साह देवघर झारखण्ड
मो – 7488742564

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