मैं नारी हूँ...
मैं नारी हूँ…
दूर कहीं
अंधकार की परतों में
खोजती अपनी ही छवि,
चल रही हूँ वक्त के साथ
अपने अस्तित्व की आहट लिए।
मैं नारी हूँ…
कभी कोमल भावनाओं की प्रतिमा,
तो कभी लावा बनकर
फूटती ओवाज
मेरे आँचल में है चाँद सितारे,
पर भीतर कहीं एक सवाल है
मैं कौन हूँ?
हर लम्हा करती रही हूँ समझौते,
फिर भी क्यों मुझे
परिभाषाओं में कसा जाता है?
कभी बेटी, कभी पत्नी, कभी माँ,
कभी बस एक “ज़िम्मेदारी” बनकर।
पर अब मैं ठहरी नहीं हैं,
अब में थकी नहीं हूँ-
अब मेरी तलाश है स्वयं की,
अपने होने के एहसास की।
मैं नारी हूँ…
दूर कहीं अंधकार में नहीं
-अब प्रकाश की ओर बढ़ती
एक चिंगारी हूँ,
जो जलकर नहीं,
जगाकर मिसाल बनेगी
बेशक बनेगी ।
डाॅ फ़ौज़िया नसीम शाद