मन अपना उपवन लगे, खिले नया नित फूल।
मन अपना उपवन लगे, खिले नया नित फूल।
पानी आशा की मिले, छँटती जिससे धूल।।
मन अपना दर्पण लगे, सहज दिखाता चित्र।
कभी चटक है टूटता, मिले न कोई मित्र।।
आशा रखते हैं जहाँ, वही निराशा पास।
बिरले हीं यह जानते, क्योंकर पड़ें उदास।।
गारंटी पल की नहीं, फिर भी हैं बेचैन।
भज ले “पाठक” ईश को, पड़े बंद कब नैन।।
:- राम किशोर पाठक (शिक्षक/कवि)